2 ग्लोबल बैंक, 1 विकसित भारत: सार्वजनिक बैंकों का महा-मंत्र

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बड़े बदलाव की तैयारी! सार्वजनिक बैंक बोले- 'विकसित भारत' को चाहिए 2 ग्लोबल बैंक

बीएस बीएफएसआई समिट: भारत को विश्व के शीर्ष 20 बैंकों में जगह दिलाने की कवायद

बीएस बीएफएसआई समिट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के शीर्ष अधिकारियों ने भारत को वैश्विक वित्तीय मानचित्र पर एक मजबूत पहचान दिलाने की वकालत की। उनकी राय है कि “विकसित भारत 2047” के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, देश को कम से कम दो ऐसे बैंकों की आवश्यकता है जो दुनिया के शीर्ष 20 बैंकों की सूची में शामिल हों। उनका मानना है कि बड़े आकार के बैंक भारत की बढ़ती आर्थिक जरूरतों को पूरा करने और वैश्विक परियोजनाओं में प्रभावी ढंग से भाग लेने के लिए अनिवार्य हैं।

बड़े बैंकों की आवश्यकता: एक बहुआयामी तर्क

भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के प्रबंध निदेशक अश्विनी तिवारी ने इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए बड़े बैंकों का होना आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को इस दिशा में समय-समय पर निर्णायक कदम उठाने होंगे।

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के एमडी और सीईओ अशील पांडे ने इस बात पर प्रकाश डाला कि बैंकों द्वारा अब पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़े प्रोजेक्ट्स को वित्तपोषित किया जा रहा है। जहाँ पहले 800 से 1500 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट आम थे, वहीं अब 8,000 से 15,000 करोड़ रुपये तक के प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक फंड किया जा रहा है। उन्होंने डॉलरीकरण में कमी और देश की बढ़ती वित्तीय मांगों को बड़े बैंकों की मांग के प्रमुख कारणों में गिनाया।

विलय की प्रक्रिया: एक ऐतिहासिक संदर्भ

यह कोई नया विचार नहीं है। पिछले एक दशक में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कई विलय की प्रक्रियाएं देखी गई हैं। एसबीआई ने पहले अपने सहयोगी बैंकों को एकीकृत किया, इसके बाद 2019 में बैंक ऑफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक का विलय हुआ। 2020 में एक और बड़े पैमाने पर एकीकरण ने इस प्रवृत्ति को जारी रखा।

अर्थव्यवस्था के साथ वित्तीय संस्थानों का तालमेल

जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था, जो अब 3 ट्रिलियन डॉलर के पार निकल चुकी है, तेजी से आगे बढ़ रही है, वैसे ही वित्तीय संस्थानों को भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना महत्वपूर्ण है। बड़े बैंक न केवल विशाल परियोजनाओं को कुशलतापूर्वक संभाल सकते हैं, बल्कि तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मानव संसाधन प्रबंधन में भी अधिक सक्षम होते हैं।

विलय प्रक्रिया की संवेदनशीलता: पारदर्शिता और सांस्कृतिक एकीकरण

पैनल में शामिल बैंकरों ने किसी भी विलय के दौरान पारदर्शिता, सांस्कृतिक तालमेल और मानव संसाधन नीतियों में संवेदनशीलता की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका मानना है कि बड़े बैंकों की स्थापना से भारत की वित्तीय प्रणाली और अधिक मजबूत होगी और देश के विकास लक्ष्यों को गति मिलेगी। कर्णाटक ने इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि लोगों, प्रक्रियाओं और तकनीक का सही एकीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत में बैंकों की एसेट क्वालिटी पहले से ही बहुत अच्छी है, इसलिए यह कोई बड़ी चुनौती नहीं होगी। तिवारी ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी विलय प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना महत्वपूर्ण है ताकि संगठन के सभी कर्मचारियों को समान अवसर मिलें।

भविष्य की ओर: एक मजबूत बैंकिंग शक्ति

कुल मिलाकर, भारतीय बैंकिंग क्षेत्र एक नए युग की दहलीज पर खड़ा है। बड़ी पूंजी, तकनीकी दक्षता और मानव संसाधन के बेहतर प्रबंधन के साथ, देश विश्वस्तरीय बैंकिंग शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रक्रिया को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया गया, तो भारत अगले दो दशकों में वैश्विक बैंकिंग मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान हासिल कर सकता है।


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