भारत के सुनहरे भविष्य के लिए समग्र प्रयास: IMF निदेशक ने सुझाए विकास के पथ
नई दिल्ली। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के एशिया और पैसिफिक विभाग के निदेशक, कृष्णा श्रीनिवासन, ने भारत के आर्थिक विकास की राह में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उनका मानना है कि भारत को न केवल अपनी घरेलू ताकत पर ध्यान केंद्रित करना होगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भी अपनी उपस्थिति मजबूत करनी होगी। “सभी क्षेत्रों में समग्र प्रयास” ही भारत को आर्थिक विकास की गति बनाए रखने और वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने में मदद करेंगे।
श्रीनिवासन ने स्पष्ट किया कि भारत के लिए दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने का मार्ग घरेलू मांग, सुधारों, निवेश, नवाचार और वैश्विक व्यापार में बढ़ते एकीकरण पर केंद्रित है। उन्होंने भारत में हाल ही में हुए सुधारों, जैसे कि वस्तु एवं सेवा कर (GST), की सराहना करते हुए कहा कि ये घरेलू उपभोग को प्रोत्साहित कर रहे हैं और मांग को बढ़ावा दे रहे हैं।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ी भागीदारी जरूरी:
2047 तक उच्च विकास दर हासिल करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को छूने के लिए, श्रीनिवासन ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को केवल घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। यह एक दो-तरफा रणनीति है जो भारत को मजबूत बनाएगी।
व्यापार का माहौल और नियामक बाधाएं:
उन्होंने भारत में व्यापार के अनुकूल माहौल बनाने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। श्रीनिवासन ने चिंता जताई कि कई मौजूदा नियम और विनियम निजी क्षेत्र की पूरी क्षमता को खोलने में बाधा डाल रहे हैं।
भारत की आर्थिक गति और भविष्य का अनुमान:
IMF के अनुसार, भारत का आर्थिक प्रदर्शन मजबूत बना हुआ है, और इस वर्ष 6% से 6.6% के बीच विकास दर रहने का अनुमान है। हालांकि, अगले वर्ष उच्च शुल्क और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण यह दर 6.2% तक धीमी हो सकती है।
घरेलू आत्मनिर्भरता और वैश्विक व्यापार का संगम:
श्रीनिवासन ने एक महत्वपूर्ण बिंदु पर प्रकाश डाला: “भारत को घरेलू आत्मनिर्भरता और वैश्विक व्यापार के बीच किसी एक का चयन नहीं करना चाहिए।” उनका मानना है कि “यह दोनों एक साथ होने चाहिए ताकि 8% या उससे अधिक की वृद्धि दर हासिल की जा सके और विकासशील भारत का लक्ष्य पूरा हो सके।” यह दर्शाता है कि आत्मनिर्भरता और वैश्विक सहयोग मिलकर ही भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र की उम्मीदें:
एशिया-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक स्थिति पर बोलते हुए, श्रीनिवासन ने कहा कि यह क्षेत्र उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। 2025 में 4.5% और 2026 में 4.1% की वृद्धि दर का अनुमान है। निर्यात, तकनीकी प्रगति और सहायक मौद्रिक नीतियां इस क्षेत्र को वैश्विक झटकों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
स्थायी विकास के लिए नीतिगत सुधार:
IMF का मानना है कि व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने वाले नीतिगत सुधार ही स्थायी और समावेशी विकास सुनिश्चित कर सकते हैं। इसमें गैर-शुल्क बाधाओं को कम करना, सेवा और डिजिटल व्यापार को शामिल करने वाले आधुनिक व्यापार समझौतों का विस्तार करना, और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) पर प्रतिबंधों में ढील देना शामिल है। ये कदम लंबे समय तक भारत के आर्थिक विकास को गति देंगे।
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