डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘फोन दीवार पर मारें, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी’ – पढ़े-लिखों की बेवकूफी पर भड़के मुख्य न्यायाधीश
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने देश में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के बढ़ते मकड़जाल पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई है। अदालत ने तीखा सवाल किया कि जब हर तरफ जागरूकता अभियान चल रहे हैं और खबरें छप रही हैं, तो आखिर पढ़े-लिखे लोग भी मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी के नाम पर ठगी का शिकार कैसे हो रहे हैं? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा, “इन पीड़ितों को आखिर हो क्या गया है? वे इस तरह के जाल में कैसे फंस रहे हैं? क्या वे इतनी बुनियादी बात भी नहीं समझ सकते कि मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी का डर कैसा?”
मुख्य न्यायाधीश ने तल्ख लहजे में कहा, “मोबाइल को दीवार पर मार दीजिए, गिरफ्तारी का ड्रामा वहीं खत्म हो जाएगा। लोगों के साथ कुछ तो गड़बड़ है। भगवान जाने यह क्या है। एक लोकतांत्रिक देश में आप किस तरह के व्यक्ति हैं, अगर आपको लगता है कि मोबाइल फोन पर आपकी गिरफ्तारी की जा रही है।” मामले में न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता एन एस नप्पिनई ने अदालत को बताया कि कड़े कदमों के बावजूद ऐसी घटनाएं थम नहीं रही हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि पिछले सप्ताह ही एक महिला को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 2.5 करोड़ रुपये की चपत लगा दी गई।
प्रधान न्यायाधीश ने फिर दोहराया, “क्या लोग इतनी बेसिक बात भी नहीं समझ सकते? मोबाइल पर गिरफ्तारी का डर कैसा? फोन फेंक दीजिए, सब खत्म हो जाएगा। लोग खुद को शिकार बनने दे रहे हैं। यह देखकर निराशा होती है कि शिक्षित वर्ग भी इस ठगी का शिकार है। अगर इस उम्र में आप डिजिटल अरेस्ट हो रहे हैं, तो अगली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे? लोग यह पता लगाने के लिए कम से कम अदालत की वेबसाइट तो देख सकते हैं कि उनके खिलाफ कोई आदेश है भी या नहीं।”
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ जाली दस्तावेजों से जुड़ी डिजिटल अरेस्ट की शिकायतों पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंकों को अब ग्राहकों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ की तरह काम करना होगा। सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने बताया कि न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ऐसे मामलों में 50 प्रतिशत की कमी आई है। बैंक अब संदिग्ध लेनदेन को पहचान रहे हैं और आरबीआई के साथ मिलकर नए नियम बनाए जा रहे हैं।
अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि वह अब बैंकों की जवाबदेही तय करने पर विचार कर रही है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम यह निर्देश देने का प्रस्ताव कर रहे हैं कि जहां भी बैंक की लापरवाही के कारण ऐसी धोखाधड़ी होगी, वहां बैंक को पीड़ित को मुआवजा देना होगा और अभियोजन का सामना भी करना होगा। ऐसा करना अब जरूरी हो गया है।” पीठ ने साफ कर दिया कि वित्तीय संस्थानों की चूक होने पर पीड़ितों के नुकसान की पूरी भरपाई बैंकों को ही करनी चाहिए।
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