डीएन गौतम का तर्क: राम मर्यादा पुरुषोत्तम, पर मर्यादा लोक की, शास्त्र की नहीं!

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DN Gautam

राम: मर्यादाओं के प्रतीक, जनहित सर्वोपरि

भगवान राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” के रूप में जाना जाता है, और इसका श्रेय उनके जीवन के हर पहलू में मर्यादाओं के unwavering पालन को जाता है। चाहे वे एक शिष्य, पति, भाई, पुत्र, राजा या योद्धा के रूप में हों, राम ने हमेशा मर्यादाओं का सम्मान किया। उन्होंने न केवल शास्त्रों में वर्णित मर्यादाओं का, बल्कि लोक (आम जन) द्वारा स्थापित मर्यादाओं का भी पालन किया।

जनहित में शास्त्र त्याग: एक अनूठा उदाहरण

राम की महानता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जब भी शास्त्रोक्त और लोक मर्यादाओं के बीच चुनाव का प्रश्न आया, तो उन्होंने हमेशा लोक मर्यादा को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह साबित किया कि जनहित और आम जन की भावनाओं का सम्मान किसी भी शासक के लिए सर्वोपरि है, भले ही उसके निजी हित प्रभावित हों।

सीता का त्याग: लोक मर्यादा के लिए निजी हित का बलिदान

सीता के परित्याग की घटना राम के लोकहितकारी दृष्टिकोण का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। एक धोबी द्वारा अपनी पत्नी से कही गई बात, जो राम के चरित्र पर संदेह व्यक्त कर रही थी, ने राजा राम को गहराई से प्रभावित किया। प्रजा के बीच उठ रहे संदेहों को मिटाना उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था, भले ही इसका अर्थ उन्हें अपनी निजी भावनाओं और सीता के प्रति अपने प्रेम का त्याग करना पड़े। उन्होंने गुप्तचरों से सीता की व्यथा को समझा और अंततः वाल्मीकि के आश्रम में उन्हें आश्रय दिलवाया, जहाँ लव-कुश का जन्म हुआ। इस प्रसंग में, राम ने न केवल अपनी पत्नी की सुरक्षा की मर्यादा का पालन किया, बल्कि पति धर्म का भी निर्वाह किया, और सबसे बढ़कर, उन्होंने आम जन की मर्यादा की रक्षा करते हुए उनकी शंकाओं का समाधान किया।

‘स्टेट क्राफ्ट’ की नीति: एक कुशल शासक का आदर्श

लेखक का मानना है कि राम ने “स्टेट क्राफ्ट” की नीति अपनाई, जिसका अर्थ है राज्य-कला या शासन-कला। इस नीति के माध्यम से उन्होंने अघोषित महानतम लक्ष्यों को प्राप्त किया। यह दर्शाता है कि राम एक ऐसे शासक थे जो न केवल नैतिक रूप से श्रेष्ठ थे, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अत्यंत कुशल थे।

युद्ध में भी मर्यादित: संयम और सम्मान का प्रतीक

लंका में रावण से युद्ध से पूर्व, राम ने रावण को एक और अवसर दिया। यह उनकी मर्यादा और संयम का परिचायक है। युद्ध उनके लिए एक मजबूरी थी, लेकिन उन्होंने अपने और दुश्मन दोनों के हितों का ख्याल रखा।

माताओं और पत्नियों के प्रति सम्मान: मर्यादा का अनूठा पाठ

राम के जीवन के कई प्रसंग उनकी माताओं और पत्नियों के प्रति उनके अगाध सम्मान को दर्शाते हैं। कैकई के वरदानों का पालन करते हुए वनगमन और मंदोदरी के प्रति राम का विनम्र व्यवहार, उनकी महानता और मर्यादा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मंदोदरी द्वारा राम के विनम्र व्यवहार की प्रशंसा, विजेता के रूप में भी उनकी विजय के दंभ से मुक्ति को दर्शाती है।

राम राज्य: समता और सद्भाव का आदर्श

राम राज्य को समता और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है। तुलसीदास के शब्दों में, “बैर न कर काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई” – राम के राज्य में कोई किसी से शत्रुता नहीं करता था और उनके प्रताप के कारण सभी की आंतरिक विषमता या भेदभाव समाप्त हो गया था।

निष्कर्ष

भगवान राम का जीवन मर्यादाओं के पालन, जनहित को सर्वोपरि रखने और कुशल शासन-कला का एक आदर्श उदाहरण है। उनके जीवन से आज भी शासकों और आम जन को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

(लेखक श्रीराम की आत्मकथा आदि पुस्तकों के लेखक व पूर्व डीजीपी हैं)


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