आधार अब जन्म का पक्का सबूत नहीं: उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में बड़ा बदलाव, लाखों पर असर की आशंका
एक अहम प्रशासनिक बदलाव के तहत, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र अब आधार कार्ड को जन्म प्रमाण पत्र या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। यह निर्णय लाखों नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर उन लोगों के लिए जो अब तक आधार को ही अपनी पहचान का एकमात्र पुख्ता जरिया मानते रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में सख्ती, आधार को मानने से इंकार
उत्तर प्रदेश की योजना विभाग ने सभी सरकारी विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि आधार कार्ड को जन्म प्रमाण पत्र मानने की प्रक्रिया को तुरंत रोका जाए। विभाग के विशेष सचिव अमित सिंह बंसल द्वारा भेजे गए आदेश में कहा गया है कि आधार कार्ड में जन्म प्रमाण पत्र संलग्न नहीं होता, इसलिए इसे कानूनी रूप से जन्मतिथि का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस आदेश के बाद, आधार को जन्म प्रमाण पत्र के रूप में स्वीकार करना अब अवैध हो गया है।
महाराष्ट्र में भी आधार-आधारित जन्म प्रमाण पत्र रद्द
महाराष्ट्र सरकार ने भी इसी तर्ज पर आदेश जारी किया है। राज्य के राजस्व विभाग के अनुसार, आधार कार्ड के आधार पर जारी किए गए विलंबित जन्म प्रमाण पत्र अब मान्य नहीं होंगे। जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम 2023 के लागू होने के बाद, केवल आधार के आधार पर बने सभी जन्म प्रमाण पत्र रद्द कर दिए जाएंगे। इतना ही नहीं, ऐसे प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
राजस्व विभाग की 16-बिंदु सत्यापन गाइडलाइन के तहत, 11 अगस्त 2023 के संशोधन के बाद डिप्टी तहसीलदारों द्वारा जारी किए गए आदेशों को वापस लिया जाएगा और उन्हें जिला कलेक्टर या सक्षम प्राधिकारी स्तर पर पुनः सत्यापित किया जाएगा।
क्या है इस फैसले के मायने?
यह कदम ऐसे समय में आया है जब एक अलग संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की मतदाता सूची में शामिल करने के लिए आधार को पहचान पत्र के रूप में स्वीकार करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि मतदाता सूची के विशेष तीव्र संशोधन (SIR) प्रक्रिया के दौरान आधार को अन्य 11 अनुमत दस्तावेजों के साथ पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए।
अवैध प्रवासियों पर भी योगी सरकार का शिकंजा
वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी जिलाधिकारियों को अवैध प्रवासियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द को अपनी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया है। सरकारी बयान के अनुसार, सभी जिलों को अपने क्षेत्र में रहने वाले अवैध प्रवासियों की पहचान कर नियमों के अनुसार कार्रवाई करने को कहा गया है। इसके अलावा, हर जिले में अस्थायी निरुद्ध केंद्र (Detention Centres) स्थापित करने के भी निर्देश दिए गए हैं, जहाँ विदेशी नागरिकता वाले अवैध प्रवासियों को सत्यापन पूरा होने तक रखा जाएगा और फिर उन्हें उनके मूल देश वापस भेजा जाएगा।
उत्तर प्रदेश की नेपाल से खुली सीमा के कारण नेपाली नागरिकों का आवागमन निर्बाध रहता है, लेकिन अन्य देशों के नागरिकों के लिए जांच अनिवार्य है। ये निर्देश ऐसे समय में आए हैं जब पूरे देश में मतदाता सूची के विशेष संशोधन का काम चल रहा है, जिसकी अंतिम सूची 7 फरवरी 2026 को जारी होगी।
सुधार या नई परेशानी?
आधार कार्ड को जन्म प्रमाण पत्र के स्थान पर अस्वीकार करने का उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार का निर्णय प्रशासनिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण, लेकिन आवश्यक सुधार की ओर इशारा करता है। कई सालों से आधार को विभिन्न दस्तावेजों के लिए ‘सर्वस्वीकृत’ प्रमाण माना जाता रहा, लेकिन यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया कि आधार केवल पहचान का साधन है, जन्म का प्रमाण नहीं। जन्म प्रमाण पत्र एक कानूनी दस्तावेज है, जिसका आधार अभिलेखीय सत्यापन होता है, न कि स्व-घोषित या अप्रमाणित जानकारी।
हालांकि, यह भी सच है कि इस निर्णय से लाखों नागरिकों को दस्तावेज़ी प्रक्रियाओं में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को, जो आधार कार्ड को ही अपनी जन्मतिथि का मुख्य प्रमाण मानते आए हैं। ऐसे में, सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकल्पों की जानकारी, प्रमाणपत्र बनवाने की सरल प्रक्रिया और समय पर सहायता उपलब्ध हो।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा पहले से जारी आधार-आधारित जन्म प्रमाण पत्रों को रद्द करना और अधिकारियों पर कार्रवाई की चेतावनी, प्रशासन की रिकॉर्ड की शुद्धता सुनिश्चित करने की गंभीरता को दर्शाती है। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि आम नागरिकों पर इसका अनावश्यक बोझ न पड़े।
निष्कर्षतः, आधार को जन्म प्रमाण पत्र के रूप में अस्वीकार करने का निर्णय प्रशासनिक शुद्धता की दृष्टि से उचित है। परंतु, इसके क्रियान्वयन में नागरिकों की सुविधा, दस्तावेजों की सुलभता और अधिकारों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी ही होगी, तभी यह कदम वास्तव में सार्थक साबित हो सकेगा।
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