डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest): घर बैठे ‘हथकड़ी’?  वीडियो कॉल और ‘साइबर कैद’

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PEEYUSH UPADHYAY
पीयुष उपाध्याय एक अनुभवी समाचार संपादक हैं, जो Aware Media Network के लिए देश-दुनिया की प्रमुख खबरों, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग सुनिश्चित करते हैं। उनका अनुभव...
- Editor
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Digital Arrest Scam concept showing fake police on video call and scared victim
'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम में वीडियो कॉल पर वर्दी पहनकर डराते साइबर ठग।

डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest): घर बैठे ‘हथकड़ी’? जानिए कैसे एक वीडियो कॉल पर लोग हो रहे हैं ‘साइबर कैद’ और लुट रही है जिंदगी भर की कमाई

क्या आप अपने ही घर में, अपने ही सोफे पर बैठकर ‘गिरफ्तार’ हो सकते हैं? जवाब है-हाँ। भारत में साइबर ठगी का एक नया और बेहद खौफनाक तरीका सामने आया है-“डिजिटल अरेस्ट” (Digital Arrest)। इसमें न पुलिस आपके घर आती है, न हथकड़ी लगती है, फिर भी आप घंटों (कभी-कभी कई दिनों) तक कैमरे के सामने डरे-सहमे बैठे रहते हैं और अपनी लाखों की जमा-पूंजी ठगों के हवाले कर देते हैं।

कैसे पढ़े-लिखे लोग भी इस ‘मनोवैज्ञानिक खेल’ (Mind Game) का शिकार बन रहे हैं? क्या है वो पार्सल या आधार कार्ड का झूठ? और अगर आपके साथ ऐसा हो जाए तो क्या करें? जानिए इस विस्तृत रिपोर्ट में।

आखिर क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’? (What is Digital Arrest?)

सबसे पहले और सबसे जरूरी बात-भारतीय कानून (IPC/BNS) में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई प्रावधान ही नहीं है।
यह साइबर अपराधियों द्वारा रचा गया एक ऐसा ‘मायाजाल’ है, जिसमें वे वीडियो कॉल (Skype, WhatsApp, Google Meet) के जरिए पीड़ित को यह विश्वास दिलाते हैं कि वह सरकारी एजेंसियों की डिजिटल निगरानी (Digital Surveillance) में है। वे पीड़ित को डराते हैं कि अगर उसने कॉल काटा, कैमरा बंद किया या किसी को बताया, तो पुलिस तुरंत उसके घर पहुंच जाएगी और उसे और उसके परिवार को गिरफ्तार कर लेगी।

ठगी का तरीका: स्टेप-बाय-स्टेप समझिए (The Modus Operandi)

ठगों का तरीका बेहद सधा हुआ, प्रोफेशनल और डरावना होता है। इसे 4 चरणों में समझा जा सकता है:

स्टेप 1: डर की शुरुआत (The Trap)

  • कूरियर स्कैम: आपको कॉल आएगा कि “आपका एक पार्सल (FedEx/Blue Dart) ताइवान या मुंबई जा रहा था, जिसमें MDMA ड्रग्स, एक्सपायर्ड पासपोर्ट या क्रेडिट कार्ड्स मिले हैं।”
  • टेलीकॉम स्कैम: “आपके आधार कार्ड पर एक सिम जारी हुआ है जिससे गैर-कानूनी विज्ञापन या धमकी भरे कॉल किए गए हैं। 2 घंटे में आपका नंबर बंद हो जाएगा।”

स्टेप 2: पुलिस को ट्रांसफर (The Transfer)

जैसे ही आप घबराते हैं, कॉलर कहता है-“मैं आपकी बात मुंबई पुलिस की साइबर क्राइम ब्रांच से करा रहा हूँ।” कॉल ट्रांसफर होती है और अब कोई भारी आवाज में बात करता है। आपको एक फर्जी FIR की कॉपी और अरेस्ट वारंट व्हाट्सएप पर भेजा जाता है, जिस पर सरकारी मुहर और आपका नाम होता है।

स्टेप 3: वीडियो कॉल और डिजिटल जेल (The Digital Jail)

अब आपको Skype या WhatsApp वीडियो कॉल पर आने को कहा जाता है।

  • सेटअप: सामने वाला पुलिस की वर्दी में होता है। पीछे पुलिस स्टेशन जैसा माहौल दिखता है (जो अक्सर क्रोमा स्क्रीन या फेक स्टूडियो होता है)। वॉकी-टॉकी की आवाजें आती हैं।
  • नियम: आपको कहा जाता है-“जब तक जांच पूरी नहीं होती, आप कैमरे के सामने से नहीं हट सकते। न किसी से बात करेंगे, न फोन छुएंगे। आप डिजिटली अरेस्ट हैं।”

स्टेप 4: फाइनेंशियल डेथ (The Loot)

जब शिकार पूरी तरह टूट जाता है, तब ‘सेटलमेंट’ या ‘फंड वेरिफिकेशन’ की बात आती है।
“आपके बैंक खाते की जांच करनी होगी कि कहीं यह पैसा टेरर फंडिंग का तो नहीं है। आप अपना सारा पैसा हमारे ‘सीक्रेट वेरिफिकेशन अकाउंट’ (RBI या सुप्रीम कोर्ट के नाम पर) में ट्रांसफर करें। जांच के बाद 15 मिनट में पैसा वापस आ जाएगा।”
डर के मारे पीड़ित पैसा भेज देता है, और फिर-ब्लैक स्क्रीन। सब गायब।

पढ़े-लिखे लोग क्यों फंस रहे हैं? (The Psychology of Fear)

हैरानी की बात है कि इस स्कैम के शिकार अनपढ़ नहीं, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, रिटायर्ड अफसर और जर्नलिस्ट हो रहे हैं। इसके पीछे 3 मनोवैज्ञानिक कारण हैं:

  1. अथॉरिटी का डर (Authority Bias): वर्दी, सरकारी लोगो और कानूनी शब्दों (FIR, Warrant) को देखकर हम सवाल पूछना भूल जाते हैं।
  2. आइसोलेशन (Isolation): ठग सबसे पहले आपको समाज से काट देते हैं (“यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, किसी को मत बताना”)। अकेलेपन में डर दोगुना हो जाता है।
  3. जल्दबाजी (Urgency): “आपके पास सिर्फ 30 मिनट हैं”-यह समय सीमा आपको सोचने का मौका नहीं देती।

बचाव का तरीका: ये 5 बातें ‘गांठ’ बांध लें

  • पुलिस वीडियो कॉल पर अरेस्ट नहीं करती: भारत की कोई भी जांच एजेंसी (CBI, ED, Police, NIA) कभी भी व्हाट्सएप या स्काइप पर वीडियो कॉल करके बयान दर्ज नहीं करती और न ही ‘डिजिटल अरेस्ट’ करती है। असली पुलिस घर आती है और नोटिस देती है।
  • पैसे की मांग = स्कैम: कोई भी सरकारी एजेंसी जांच के नाम पर कभी भी किसी खाते में पैसा ट्रांसफर करने को नहीं कहती।
  • नंबर चेक करें: अगर कॉल +92 (पाकिस्तान) या किसी अन्य विदेशी कोड से आ रहा है और वो खुद को भारतीय पुलिस बता रहे हैं, तो वो 100% फ्रॉड है।
  • गोपनीयता का झांसा: अगर कोई कहे कि “किसी को बताना मत”, तो सबसे पहले अपने घर वालों को बताएं। स्कैमर्स की सबसे बड़ी कमजोरी आपकी जागरूकता है।

अगर ठगी हो जाए तो क्या करें? (Golden Hour)

अगर आप पैसे भेज चुके हैं, तो पहले 1-2 घंटे (गोल्डन आवर) बहुत महत्वपूर्ण हैं।

  1. तुरंत 1930 पर कॉल करें: यह राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर है। यहाँ शिकायत दर्ज कराने से बैंक ट्रांजेक्शन फ्रीज हो सकता है।
  2. पोर्टल पर रिपोर्ट करें: www.cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
  3. बैंक को सूचित करें: अपने बैंक को तुरंत कॉल करें और फ्रॉड की जानकारी दें।

संपादक की राय (Editor’s Opinion)

“डिजिटल अरेस्ट सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि एक ‘मानसिक अपहरण’ (Mental Kidnapping) है। यह स्कैम इसलिए सफल हो रहा है क्योंकि भारतीय समाज में पुलिस और कोर्ट-कचहरी का एक स्वाभाविक डर है। ठग इसी डर का फायदा उठाते हैं।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ में इस स्कैम का जिक्र किया था और कहा था-‘रुको, सोचो और एक्शन लो’। अगर कोई आपको कैमरे पर रहने के लिए मजबूर कर रहा है, तो समझ जाइए कि वह पुलिस नहीं, बल्कि एक ‘डिजिटल गुंडा’ है। डरिए मत, फोन काटिए और ब्लॉक कीजिए। आपका डर ही उनका हथियार है, इसे उनसे छीन लीजिए।”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: क्या पुलिस व्हाट्सएप पर अरेस्ट वारंट भेज सकती है?
Ans: बिल्कुल नहीं। कानूनी नोटिस या वारंट हमेशा डाक द्वारा या व्यक्तिगत रूप से पुलिस अधिकारी द्वारा दिया जाता है, व्हाट्सएप पर नहीं।

Q2: क्या आधार कार्ड लॉक करने से मैं बच सकता हूँ?
Ans: आधार बायोमेट्रिक्स लॉक करना एक अच्छी आदत है, लेकिन जागरूकता सबसे बड़ा बचाव है।

Q3: डिजिटल अरेस्ट कॉल आने पर सबसे पहले क्या करें?
Ans: घबराएं नहीं। फोन काट दें। उस नंबर को ब्लॉक करें और अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन या 1930 पर सूचना दें।

निष्कर्ष

‘डिजिटल अरेस्ट’ 2026 की एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। तकनीक ने हमें सुविधाएं दी हैं, तो अपराधियों को भी हाई-टेक बना दिया है। इस लेख को अपने परिवार, व्हाट्सएप ग्रुप्स और खासकर बुजुर्ग माता-पिता के साथ जरूर शेयर करें, क्योंकि जागरूकता ही इस ‘अदृश्य हथकड़ी’ को तोड़ने का एकमात्र हथियार है।


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पीयुष उपाध्याय एक अनुभवी समाचार संपादक हैं, जो Aware Media Network के लिए देश-दुनिया की प्रमुख खबरों, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग सुनिश्चित करते हैं। उनका अनुभव पत्रकारिता में 7+ वर्षों का है और वे निष्पक्ष, भरोसेमंद और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कई पुरस्कार और मान्यता प्राप्त की है, जिनमें 2022 में “Best Investigative Journalist” और 2021 में “Top 10 Editors in Uttarakhand” शामिल हैं।
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