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हैदराबाद विवि में सच्चाई का मुखर उभार: नीरजा माधव और ‘सेमिनार’ से ‘संघर्ष’ तक की कहानी
हैदराबाद, 21 जनवरी। सनातन संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रति असहिष्णुता की हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में 20 जनवरी को जो घिनौनी मिसाल पेश की गई, वह वामपंथी छात्र संगठनों की सोच को एक बार फिर उजागर करती है। प्रख्यात लेखिका और भारतीय संस्कृति की प्रखर विचारक डॉ. नीरजा माधव को न केवल मंच पर बल्कि सभागार के बाहर भी आक्रामक विरोध और हिंसक नारेबाजी का सामना करना पड़ा।
मामला उस समय शुरू हुआ जब उन्हें ‘थर्ड जेंडर’ विमर्श पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था। आयोजकों के अनुरोध पर ‘भारतीय संस्कृति और थर्ड जेंडर’ विषय पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने एक विद्यार्थी के प्रश्न का साहसिक उत्तर दिया। जब छात्रों ने मनुस्मृति में समलैंगिकता के संदर्भ और उसकी कानूनी मान्यता का हवाला दिया, तो नीरजा माधव ने स्पष्ट किया कि “लेस्बियन और होमोसेक्सुअलिटी मानसिक आवश्यकता या व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है, लेकिन यह थर्ड जेंडर जैसी प्राकृतिक विकृति या अभिशाप नहीं है।”
अपनी बात को और पुख्ता करते हुए उन्होंने तथ्यात्मक सवाल दागा कि जिस मूल मनुस्मृति का वे आधार बना रहे हैं, उसे कितने विद्यार्थियों ने वास्तव में पढ़ा है? इस पर सभागार में निर्णायक चुप्पी छा गई और किसी ने भी हाथ नहीं उठाया। यही माधव की वह नैतिक जीत थी जिसने साबित किया कि बिना अध्ययन के केवल विवाद खड़ा करना उनका उद्देश्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी ग्रंथ का खंडन करने से पहले उसका सम्यक अध्ययन आवश्यक है।
सत्र समाप्त होने के एक घंटे के भीतर ही विश्वविद्यालय परिसर का माहौल तनावपूर्ण हो गया। आइसा (AISA) और एसएफआई (SFI) के सैकड़ों छात्रों ने हाथों में बैनर लहराते हुए हिंसक नारेबाजी शुरू कर दी और नीरजा माधव की कार को घेर लिया। वे जबरदस्ती माफी मांगने के लिए दबाव बना रहे थे। जब नीरजा माधव कार से बाहर आईं और उन्होंने इस प्रतिरोध का डटकर मुकाबला किया, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा, "जब मैंने कोई गलत बात कही ही नहीं, तो माफी का सवाल ही कहां उठता है? मैंने जो कुछ भी कहा, वह सत्य है। आप असहमत हो सकते हैं, पर सच्चाई से समझौता नहीं कर सकती।" इस पर छात्र और भी उग्र हो गए और मोदी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विरोधी नारे लगाने लगे। आखिरकार, 15-20 मिनट के भीतर भारी संख्या में पहुंचे विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों ने किसी तरह नीरजा माधव की कार को सुरक्षित बाहर निकाला।
यह पहला अवसर नहीं है जब हैदराबाद विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति के लेखकों को वामपंथी छात्र संगठनों ने बोलने से रोका हो, लेकिन यह अनूठा था कि नीरजा माधव ने ‘डंके की चोट पर’ अपनी बात रखी। न ही उन्होंने अंग्रेजी के दबाव में झुककर हिंदी से कन्नी काटी। जब एक छात्रा ने अंग्रेजी में प्रश्न किया, तो उन्होंने खुद को हिंदी में ही जवाब दिया, "आप हिंदी की विद्यार्थी हैं, कृपया मुझसे हिंदी में बात करें।" इस पर भी छात्रा ने अनावश्यक प्रतिरोध जताया।
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि यह घोर असहिष्णुता का परिचायक है जहाँ एक लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी को छीनने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि भारतीय विश्वविद्यालयों में इस प्रकार की मानसिकता का पनपना राष्ट्र को कमजोर करने जैसा है। वामपंथी लोग संविधान और लोकतंत्र की बात तो करते हैं, लेकिन उसका पालन स्वयं नहीं करते। सच उन्हें हजम नहीं होता, इसलिए वे हिंसा पर उतर आते हैं। यह घटना वामपंथी असहिष्णुता और सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का जीवित प्रमाण है।
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