70 साल का गुस्सा! पीओके में भड़का पाक के खिलाफ जनाक्रोश, सड़कों पर उतरे हज़ारों लोग
इस्लामाबाद: करीब सात दशक से कश्मीर के एक हिस्से पर अवैध कब्ज़ा जमाए बैठा पाकिस्तान, उस क्षेत्र की बर्बादी का ताना-बाना हर रोज़ बुन रहा है। विकास के नाम पर सिर्फ़ विनाश और लोगों के हक़ छीनकर, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के निवासियों को हर दिन मौत के मुंह धकेलने का काम कर रहा है। लेकिन अब यह सिलसिला ज़्यादा दिन चलने वाला नहीं। 70 साल का दमन और उपेक्षा पीओके में अब आक्रोश की आग बन कर भड़क उठी है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जन-सैलाब पाकिस्तान सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आया है।
पीओके में अभूतपूर्व अशांति, पाक सरकार की नींद उड़ी
हाल के वर्षों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) ने सबसे बड़ी अशांति का मंज़र देखा है। हज़ारों की संख्या में लोग नवाज़ शरीफ सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। ऑल जम्मू एंड कश्मीर पीपल्स राइट्स मूवमेंट (AAC) ने घोषणा की है कि विरोध प्रदर्शनों का अगला दौर 15 अक्टूबर से शुरू होगा। इस जनाक्रोश के जवाब में, पाकिस्तान सरकार ने ज़बरदस्त कार्रवाई करते हुए क्षेत्र में हज़ारों की तादाद में पंजाब प्रांत से अतिरिक्त सैनिक तैनात कर दिए हैं। इस्लामाबाद से भी 1,000 अतिरिक्त पुलिसकर्मी भेजे गए हैं। विरोध प्रदर्शन की आशंका के चलते सप्ताहांत में पीओके के प्रवेश और निकास द्वारों को सील कर दिया गया था, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था अन्य इलाकों में भी कड़ी कर दी गई है। यह अशांति हाल ही में तब भड़की जब एएसी, पाकिस्तान सरकार के मंत्रियों और पीओके प्रशासन के बीच हुई वार्ता विफल हो गई। एएसी द्वारा अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों और शरणार्थी सीटों को समाप्त करने पर समझौता करने से साफ इनकार करने के बाद घंटों चली मैराथन वार्ता बेनतीजा रही।
38 सूत्रीय मांगें, पाक सरकार के खिलाफ बिगुल फूंका
भ्रष्टाचार, उपेक्षा और बुनियादी अधिकारों से वंचित रखने जैसे लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों के खिलाफ स्थानीय लोगों को एकजुट करने में कामयाब रही एएसी ने पाकिस्तान सरकार के समक्ष 38-सूत्रीय मांगों का एक चार्टर पेश किया है। इन मांगों में पाकिस्तान में रह रहे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए पीओके विधानसभा में आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करना शामिल है, जिसे स्थानीय लोग प्रतिनिधि शासन को कमजोर करने वाला मानते हैं। इसके अलावा, रियायती दरों पर आटा और उचित बिजली दरें, और लंबे समय से लंबित सुधारों को लागू करने जैसी मांगें भी उठाई गई हैं।
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