
- परंपराओं का जीवंत संगम: उत्तर वाहिनी गंगा तट पर सजे अस्थायी अखाड़े
- ‘चांदो बोंगा’ की आराधना: जब सूर्य देव की किरणों से शुरू हुआ दिन
- शिव-पार्वती और जाहेर आयो का पावन जलाभिषेक
- सफा होड़ समुदाय: एक विशिष्ट और पवित्र धार्मिक पहचान
- सात्विकता की मिसाल: सादा जीवन और नशामुक्त समाज
- अखाड़ों से गूंजता सामाजिक सुधार का संदेश
- इतिहास के पन्नों से: भागीरथ मांझी और सांस्कृतिक चेतना
- अटूट विरासत: आज भी जीवंत है आदिवासियों की अस्मिता
राजमहल से दीप सिंह की विशेष रिपोर्ट
Tribal Mahakumbh: झारखंड के साहिबगंज स्थित राजमहल का उत्तर वाहिनी गंगा तट रविवार को एक भव्य आध्यात्मिक संगम का साक्षी बना। राजकीय माघी पूर्णिमा मेला 2026, जिसे ‘आदिवासी महाकुंभ’ के रूप में जाना जाता है, के अवसर पर आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि घाटों पर पैर रखने की जगह नहीं बची। झारखंड के कोने-कोने समेत बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और पड़ोसी देश नेपाल से आए लाखों श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा में डुबकी लगाकर पुण्य अर्जित किया। पूरे वातावरण में ‘हर-हर गंगे’ के उद्घोष और पारंपरिक आदिवासी मंत्रों की गूंज ने एक अलौकिक समां बांध दिया।
परंपराओं का जीवंत संगम: उत्तर वाहिनी गंगा तट पर सजे अस्थायी अखाड़े
गंगा की पावन लहरों के किनारे ‘विदिन समाज सुसार बैसी’ द्वारा पारंपरिक अखाड़ों के साथ-साथ अस्थायी मांझी थान और जाहेर थान का निर्माण किया गया। धर्मगुरु अभिराम मरांडी और भुगलू मरांडी के मार्गदर्शन में समाज के हजारों अनुयायियों ने स्नान के पश्चात मांझी थान में भगवान शिव के स्वरूप ‘मरांग बुरू’ की स्थापना की। विधि-विधान से की गई इस पूजा-अर्चना के दौरान आदिवासी संस्कृति की अनूठी और गौरवशाली झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
‘चांदो बोंगा’ की आराधना: जब सूर्य देव की किरणों से शुरू हुआ दिन
आदिवासी संस्कृति में प्रकृति की पूजा सर्वोपरि है। गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु पीतल के लोटों में पवित्र जल भरकर गंगा की धारा में खड़े हो जाते हैं। यहाँ सफा होड़ समुदाय द्वारा सूर्य देव यानी ‘चांदो बोंगा’ की सामूहिक आराधना की जाती है। इस समुदाय की गहरी मान्यता है कि सूर्य देव ही समस्त सृष्टि के जीवनदाता हैं। माघी पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर श्रद्धालु 24 घंटे का कठिन उपवास रखते हैं, रात भर भक्ति जागरण करते हैं और भोर होते ही सूर्य को जल अर्पित कर अपना व्रत पूर्ण करते हैं।
शिव-पार्वती और जाहेर आयो का पावन जलाभिषेक
सूर्य पूजन के पश्चात भक्ति का यह कारवां अपने-अपने धर्मगुरुओं के अखाड़ों की ओर बढ़ता है। यहाँ अस्थायी मांझी थान में भगवान शिव-पार्वती और जाहेर थान में ‘जाहेर आयो’ को पूरी श्रद्धा के साथ गंगाजल अर्पित किया जाता है। अनुशासित कतारों में खड़े श्रद्धालु सुख-समृद्धि, खुशहाली और निरोगी काया की प्रार्थना करते हैं। श्रद्धा और अनुशासन का यह मेल देखते ही बनता है।
सफा होड़ समुदाय: एक विशिष्ट और पवित्र धार्मिक पहचान
सफा होड़ समुदाय, जो संथाल समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। जहाँ पारंपरिक संथाल समाज मरांग बुरू और जाहेर एरा जैसी शक्तियों को पूजता है, वहीं सफा होड़ समुदाय इनके साथ-साथ सूर्य देव, विष्णु, महेश और भगवान राम में भी अटूट विश्वास रखता है। यह समुदाय अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी एकेश्वरवाद की अनूठी अवधारणा को आत्मसात किए हुए है।
सात्विकता की मिसाल: सादा जीवन और नशामुक्त समाज
सफा होड़ समुदाय की पहचान उनके शुद्ध आचरण और सादगी से होती है। यह समुदाय पूरी तरह शाकाहारी है और मांस-मदिरा या किसी भी प्रकार के नशों से कोसों दूर रहता है। सफेद वस्त्र, सादा भोजन और आत्मसंयम इनके जीवन का मूल मंत्र है। अनुशासन का आलम यह है कि इस समुदाय के लोग दूसरों के घरों में भोजन करने से भी परहेज करते हैं, जो उनके आत्मसंयम की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
अखाड़ों से गूंजता सामाजिक सुधार का संदेश
राजमहल के इन अखाड़ों का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यहाँ के धर्मगुरु अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज को हिंसा, नशा और जीव हत्या के खिलाफ जागरूक करते हैं। घरों में तुलसी का पिंड स्थापित करना और शिव का त्रिशूल रखना इस परंपरा का अभिन्न अंग है। प्रकृति और परमात्मा की इस मिली-जुली आराधना में पिल्चू हाड़म और पिलिचुरी बूढ़ी की गाथाएं भी श्रद्धा के साथ सुनी जाती हैं।
इतिहास के पन्नों से: भागीरथ मांझी और सांस्कृतिक चेतना
इस महान परंपरा की जड़ें 1874 के ऐतिहासिक ‘खेरवार आंदोलन’ में छिपी हैं। भागीरथ मांझी, लाल हेंब्रम और पाइका मुर्मू जैसे नायकों के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन ने संथाल समाज में शुद्धिकरण, एक ईश्वर की पूजा और नशामुक्ति की लौ जलाई थी। यद्यपि 1855 के संथाल हूल और ब्रिटिश दमन के बाद इसके राजनैतिक आयाम बदले, लेकिन इसकी धार्मिक और सामाजिक सुधार की विरासत आज भी अडिग है।
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अटूट विरासत: आज भी जीवंत है आदिवासियों की अस्मिता
आज राजमहल की उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर जुटने वाले लाखों सफा होड़ श्रद्धालु खुद को उसी महान नायक भागीरथ मांझी का वंशज मानते हैं। माघी पूर्णिमा का यह भव्य आयोजन केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना, गौरवशाली इतिहास और सामाजिक सुधार की एक जीवंत मिसाल है। यह महाकुंभ संदेश देता है कि गंगा की लहरें केवल पाप नहीं धोतीं, बल्कि परंपराओं और मूल्यों को भी सींचती हैं।
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