माउंटआबू का अर्बुदादेवी मंदिर: 365 सीढ़ियों का सफर और एक प्राचीन शक्तिपीठ
राजस्थान का सुरम्य हिल स्टेशन माउंटआबू, अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपनी गहरी धार्मिक आस्थाओं का भी केंद्र है। इसी कड़ी में, आज हम आपको सिरोही जिले में स्थित अतिप्राचीन अर्बुदादेवी मंदिर की यात्रा पर ले चलेंगे। यह मंदिर न केवल एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, बल्कि इतिहास और किंवदंतियों से भी ओत-प्रोत है।
शक्तिपीठ का रहस्य: कात्यायनी का स्वरूप
अर्बुदादेवी मंदिर, मां दुर्गा के छठे स्वरूप, मां कात्यायनी को समर्पित है। मां दुर्गा का यह स्वरूप पहाड़ों के ऊपर एक प्राकृतिक गुफा में विराजमान हैं। यह पवित्र स्थल देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है, जो इसे और भी महत्वपूर्ण बनाता है। साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां का माहौल किसी मेले से कम नहीं होता। दिन भर भक्तों की लंबी कतारें मां के दर्शन के लिए इंतजार करती हैं।
धार्मिक धरोहरों का संगम
माउंटआबू केवल एक मनोरम हिल स्टेशन ही नहीं, बल्कि धार्मिक रूप से भी बेहद समृद्ध है। यहां विभिन्न क्षेत्रों में एक से बढ़कर एक पौराणिक धरोहरें मौजूद हैं। इन्हीं में से एक है देलवाड़ा मार्ग पर स्थित अर्बुदादेवी मंदिर। अरावली पर्वतमाला की ऊंची चोटी पर, एक प्राकृतिक गुफा में विराजमान मां कात्यायनी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह एक तीर्थयात्रा का अनुभव है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
पौराणिक कथाओं का आधार
अर्बुदादेवी मंदिर से जुड़ी एक अतिप्राचीन पौराणिक कथा है। मान्यता है कि जब भगवान शिव अपनी प्रिय पत्नी सती के मृत शरीर को लेकर तांडव नृत्य कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को खंडित कर दिया था। इसी दौरान, माता सती के होंठ माउंटआबू में गिरे थे, और इसी कारण इस स्थान को एक शक्तिपीठ के रूप में मान्यता मिली। इसी घटना के चलते इस मंदिर का नाम ‘अधरदेवी’ भी पड़ा। कहा जाता है कि ऋषि वशिष्ठ ने भी इसी शिखर पर यज्ञ किया था, ताकि पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए देवताओं की सहायता प्राप्त की जा सके।
परमार राजवंश और अर्बुदा देवी का संबंध
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 9वीं से 14वीं शताब्दी तक पश्चिम-मध्य भारत के मालवा और आसपास के क्षेत्रों पर शासन करने वाले परमार राजवंश का अर्बुदादेवी मंदिर से गहरा संबंध रहा है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि परमार शासकों की उत्पत्ति माउंटआबू के ‘अग्निकुंड’ से हुई थी। अर्बुदा देवी को उनकी कुलदेवी के रूप में पूजा जाता था। यह अग्निकुंड की कथा, जो परमारों की उत्पत्ति को माउंट आबू से जोड़ती है, अर्बुदा देवी के प्रति परमार राजवंश की गहरी भक्ति का एक मजबूत पौराणिक आधार प्रदान करती है।
अर्बुदादेवी मंदिर, अपने धार्मिक महत्व, पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक जुड़ाव के साथ, माउंटआबू की एक अनमोल धरोहर है, जो हर साल लाखों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
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