जब इंद्र का भय और काम का प्रलोभन, भक्ति की शक्ति को परखने लगे!
इस नश्वर संसार की मायावी जल्पनाओं में फंसे जीव की व्यथा अनूठी है। नीचे के लोकों में संतोष न पाकर, ऊंचे लोकों में भी उसे चैन कहाँ? हर पल स्वर्ग सी सुख की अभिलाषा, पर क्या सचमुच स्वर्ग का सुख आत्म-तृप्ति दे सकता है? पिछले प्रसंगों से तो यही प्रतीत होता है कि नहीं। जब स्वर्ग के अधिपति देवराज इंद्र स्वयं अशांत हैं, तो अन्य जनों की क्या बिसात!
देवराज इंद्र के मन में एक संशय ने जड़ें जमा लीं। उन्होंने देखा कि नारद मुनि दीर्घकाल से गहन समाधि में लीन हैं। एक विचार उनके हृदय में कौंधा – “कहीं नारद मुनि मेरी इन्द्रासन पर तो नहीं? कहीं वे मेरे पद के आकांक्षी तो नहीं?” यह विचार आते ही उनका विवेक धूमिल पड़ गया। पद का अहंकार, बुद्धि पर ऐसा पर्दा बना कि वे स्वयं संशय के दास हो गए। परिणामस्वरूप, उन्होंने कामदेव को आवाहन किया और कहा:
“मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।। सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।।”
कामदेव का यथोचित सम्मान कर, इंद्र ने उसे आदेश दिया, “हे कामदेव! आपकी शक्ति जगविख्यात है। आपने अनेकों बार देवताओं के कार्य सिद्ध किए हैं। आज आप नारद मुनि की समाधि भंग कर, मेरी इस शंका का निवारण करें।”
कामदेव के लिए यह प्रत्यक्ष सम्मान अप्रत्याशित था। यूं तो संसार में ‘राम’ के उपासक विरले हैं, पर ‘काम’ के उपासक चहुंओर मौजूद हैं। फिर भी, कामदेव के साथ एक ऐसा श्राप जुड़ा था कि उसे कभी सार्वजनिक सम्मान नहीं मिला। वह सदा गुप्त रूप से पूजित होता रहा, जैसे अंधकार में छिपी अग्नि। आज देवराज इंद्र ने स्वयं उसे बुलाकर सम्मानित किया, तो वह मानो अपने ही मोह के बंधन में बंध गया।
सम्मान का नशा केवल मनुष्यों को ही नहीं, देवों को भी विवेकहीन बना देता है। कामदेव ने यह विचार नहीं किया कि एक बार उसने भगवान शंकर की समाधि भंग करने का दुस्साहस किया था और उसका परिणाम कितना विनाशकारी हुआ था। इतिहास की शिक्षा केवल वही ग्रहण करता है, जो अहंकार के पर्दे से मुक्त हो। परंतु यहां तो देवराज इंद्र और कामदेव, दोनों ही उसी अहंकार के जाल में उलझ चुके थे।
देवराज इंद्र की मूर्खता अपने चरम पर थी। उन्हें यह जानने की सुध ही नहीं रही कि नारद मुनि की समाधि का उद्देश्य क्या है। क्या वे सचमुच स्वर्ग-सिंहासन पर अधिकार चाहते हैं, या वे प्रभु-भक्ति में लीन हैं? परंतु जब मन पर पद का मद छा जाता है, तब सत्य की आवाज सुनाई नहीं देती।
काश! इंद्र को प्रभुचरणों की याद होती, तो वे यह समझ पाते कि प्रभु के भक्त के लिए स्वर्ग, मात्र मृग-मरीचिका के समान है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस स्थिति का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है:
“सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।”
अर्थात, जैसे मूर्ख कुत्ता अपनी सुखी हड्डी लेकर इसलिए भागता है कि कहीं सिंह उसे न छीन ले, वैसे ही मूढ़ इंद्र भी नारद मुनि को देखकर भयभीत हो उठे कि कहीं वे उनका पद न छीन लें। परंतु जिन्हें प्रभु-भक्ति की समाधि की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त हो चुकी है, उन्हें स्वर्ग के क्षणिक वैभव से क्या प्रयोजन?
अब कामदेव, देवराज इंद्र के आदेशानुसार, नारद मुनि की ओर प्रस्थान करता है। वहां पहुंचकर उसने अपनी मायावी शक्ति से वसंत ऋतु का सृजन कर दिया। क्षण भर में समस्त वातावरण नवजीवन से प्रस्फुटित हो उठा। वृक्षों पर विविध रंगों के पुष्प खिल उठे, कोयल की मधुर कूक गूँजने लगी, भौंरे गुंजार करने लगे। सुगंधित पवन तीनों दिशाओं से बहने लगी, जो कामाग्नि को प्रज्वलित करने वाली थी। रम्भा और अन्य देवांगनाएं संगीत और नृत्य से वातावरण को और भी मनमोहक बनाने लगीं।
कामदेव यह दृश्य देखकर हर्षित हुआ और बोला, “अब तो यह समाधि अवश्य भंग होगी। नारद मुनि जैसे स्थिर तपस्वी भी इस वातावरण से विचलित हुए बिना न रह सकेंगे।”
परंतु यही कामदेव की भ्रांति थी। वह यह भूल गया कि भक्ति की ज्वाला में काम की अग्नि स्वयं भस्म हो जाती है। नारद मुनि, जिनके हृदय में राम नाम का अनहद नाद गूँज रहा था, वे संसार के किसी भी आकर्षण से विचलित कैसे हो सकते थे? जिसकी दृष्टि ‘प्रेम’ में स्थिर है, उसे ‘काम’ डिगा नहीं सकता।
देवराज इंद्र और कामदेव का यह प्रयत्न केवल यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त था कि जिस मनुष्य के अंतःकरण में असुरक्षा और अहंकार हो, वह देव होकर भी पतन के मार्ग पर चल पड़ता है। प्रभु का सच्चा भक्त तो स्वयं में पूर्ण होता है। उसे पद, प्रतिष्ठा, यश या वैभव का मोह नहीं रहता।
इंद्र जैसे देवता, जो स्वर्ग के राजा होकर भी भयभीत हैं, वे वास्तव में दीन हैं। और नारद जैसे मुनि, जो संन्यासी होकर भी अटल हैं, वे वास्तव में धन्य हैं।
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