हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का बहुत महत्व माना गया है। पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा अपनी पूर्ण आकार में रहता है और श्रद्धापूर्वक दर्शन और पूजा करने से कृपा प्राप्त होती है। पूर्णिमा तिथि पर न सिर्फ चंद्र देव बल्कि श्रीहरि विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। पौष पूर्णिमा को शाकंभरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। वहीं मां शाकंभरी को अन्न की देवी माना जाता है। पूर्णिमा तिथि का महत्व तब अधिक बढ़ जाता है, जब यह पौष माह में पड़ती है।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक पौष पूर्णिमा पर पूजा, जप-तप और व्रत करने से जीवन से जुड़े सभी दोष दूर होते हैं और जातक को पुण्यफल की प्राप्ति होती है। वहीं इस दिन से प्रयागराज में कल्पवास की शुरूआत होती है, जिसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है। तो आइए जानते हैं पौष पूर्णिमा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में…
तिथि और मुहूर्त
हिंदू पंचांग के मुताबिक पौष पूर्णिमा की तिथि 02 जनवरी की शाम 06:53 मिनट पर शुरू हुई है। वहीं आज यानी की 03 जनवरी की दोपहर 03:32 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 03 जनवरी 2026 को शाकंभरी पूर्णिमा मनाई जा रही है।
पूजन विधि
इस दिन संभव हो तो किसी पवित्र नदी जैसे गंगा, यमुना या नर्मदा नदी में स्नान करें। वहीं अगर नदी में स्नान संभव न हो, तो नहाने के पानी में गंगाजल डालकर स्नान करें। स्नान आदि के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और फिर घर के मंदिर में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें। इस दिन भगवान विष्णु और मां शाकंभरी की पूजा का विशेष महत्व होता है। वहीं इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को ऊनी वस्त्र, कंबल, अन्न या फल का दान करें।
महत्व
बता दें कि पौष पूर्णिमा को शाकंभरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। मां शाकंभरी को अन्न की देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन मां शाकंभरी की पूजा करने से पूरे साल धन-धान्य की कमी नहीं होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी को संकट और अकाल से मुक्त करने के लिए मां शाकंभरी का प्राकट्य हुआ था।
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