शरद पूर्णिमा: अमृत की वर्षा और सौभाग्य की रात
कल, सोमवार को शरद पूर्णिमा का पावन पर्व उल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह रात्रि विशेष रूप से धन की देवी, माता लक्ष्मी की आराधना के लिए समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत की वर्षा करता है। इसी पावन परंपरा का निर्वहन करते हुए, हम घरों में खीर बनाते हैं और उसे रात्रि में चंद्रमा की शीतल रोशनी में रखते हैं। कहा जाता है कि इस खीर में चंद्रलोक से बरस रहा अमृत समाहित हो जाता है, जिसके सेवन से शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ्य लाभ होता है।
शरद पूर्णिमा से जुड़ी एक हृदयस्पर्शी पौराणिक कथा
प्राचीन काल की बात है, एक समृद्ध साहूकार की दो पुत्रियां थीं। दोनों ही बहनें प्रतिवर्ष पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। बड़ी पुत्री निष्ठा और समर्पण के साथ पूरे विधान से व्रत का पालन करती थी, परंतु छोटी पुत्री अपनी भूख को नियंत्रित न कर पाती और व्रत को बीच में ही अधूरा छोड़ देती थी। इस प्रकार समय बीतता गया और दोनों का विवाह भी हो गया।
दुर्भाग्यवश, छोटी पुत्री के साथ एक गंभीर समस्या थी। उसके द्वारा धारण किए गए हर पूर्णिमा के व्रत के अधूरा छोड़ने के कारण, उसके जन्म लेने वाले प्रत्येक शिशु की नवजात अवस्था में ही मृत्यु हो जाती थी। इन दुखों से आहत छोटी बहन ने एक दिन पंडितों से इस कष्ट का कारण पूछा। पंडितों ने उसे स्पष्ट किया कि पूर्णिमा के व्रत को अधूरा छोड़ने के कारण ही उसे इस प्रकार की पीड़ा भुगतनी पड़ रही है। उन्होंने उसे सलाह दी कि यदि वह पूर्ण श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए इस बार व्रत करेगी, तो ही उसकी संतान जीवित रह सकेगी।
छोटी बहन ने पंडितों की बात मानी और पूरे विधि-विधान से व्रत का पालन किया। कुछ समय पश्चात, उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई। परंतु, कुछ ही दिनों में वह शिशु भी काल का ग्रास बन गया। इस असहनीय दुख से विचलित होकर, छोटी बहन रोते हुए अपने मृत शिशु को एक पीढ़े पर लिटाकर, उसे वस्त्र से ढककर, अपनी बड़ी बहन को बुलाने चली गई।
जब बड़ी बहन आई, तो छोटी बहन ने उसे उसी पीढ़े पर बैठने का आग्रह किया, जहाँ उसने अपने मृत शिशु को लिटा रखा था। जैसे ही बड़ी बहन उस पर बैठने लगी, उसकी साड़ी का एक छोर शिशु को छू गया। आश्चर्यजनक रूप से, शिशु अचानक रोने लगा। यह देखकर बड़ी बहन हतप्रभ रह गई और गुस्से में बोली, “तुम मुझे कलंकित करना चाहती थी? यदि यह बच्चा मर जाता, तो सारा दोष मुझ पर आता।” इस पर छोटी बहन ने रोते हुए उत्तर दिया, “दीदी, यह बच्चा तो पहले से ही मृत था। तुम्हारे पुण्य और पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से यह जीवित हुआ है।” इस घटना के उपरांत, छोटी बहन ने पूरे नगर में यह घोषणा करवाई कि पूर्णिमा का व्रत हमेशा पूरे विधि-विधान से करना चाहिए। यह व्रत न केवल संतान की रक्षा करता है, बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का संचार भी करता है।
अस्वीकरण: यहाँ प्रस्तुत जानकारी केवल प्रचलित मान्यताओं और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है। अवेयर मीडिया न्यूज़ किसी भी प्रकार की मान्यता या जानकारी की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।
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