ISL कमर्शियल डील पर छिड़ा ‘महायुद्ध’: AIFF और क्लबों के बीच आर-पार की जंग, पारदर्शिता पर गहराया सस्पेंस!

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Indian Super League के Commercial Deal पर AIFF-क्लबों में टकराव, पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल

भारतीय फुटबॉल: व्यावसायिक फैसलों की बिसात पर खींचतान और भविष्य के सवाल

भारतीय फुटबॉल के मैदान पर इस वक्त खेल से ज्यादा एक बड़े व्यावसायिक फैसले को लेकर कशमकश तेज हो गई है। यह खींचतान न केवल लीग के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रही है, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे में हलचल पैदा कर रही है।

ताजा जानकारी के अनुसार, इंडियन सुपर लीग (ISL) के क्लबों ने अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) के सामने यह मांग रखी है कि उन्हें संभावित व्यावसायिक साझेदारों से सीधे संवाद करने का अवसर दिया जाए। क्लबों का तर्क है कि साझेदारी का फैसला महज ऊंची बोली के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि कंपनियों की भावी योजना, राजस्व मॉडल और खेल को लेकर उनके दीर्घकालिक दृष्टिकोण को बारीकी से परखने के बाद ही लिया जाना चाहिए।

हैरानी की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए पहले से ही एक मूल्यांकन समिति कार्यरत है, जिसमें क्लबों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब समिति पहले से मौजूद है, तो क्लबों को अलग से वार्ता की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है? यही कारण है कि अब चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी बहस छिड़ गई है।

इस टेंडर प्रक्रिया में वर्तमान में दो प्रमुख खिलाड़ियों ने अपनी दावेदारी पेश की है। इनमें से एक बोली लगभग 64 करोड़ रुपये सालाना और दूसरी करीब 36 करोड़ रुपये सालाना बताई जा रही है। हालांकि, ये आंकड़े पिछले व्यावसायिक समझौतों और विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए संभावित आय के अनुमानों के मुकाबले बेहद निराशाजनक और कम माने जा रहे हैं।

क्लबों ने अपनी नाराजगी जताते हुए कहा है कि उन्हें टेंडर की शुरुआती शर्तें (Tender Conditions) तय करने में शामिल नहीं किया गया था, जबकि यह समझौता सीधे तौर पर भारतीय फुटबॉल के भविष्य और उसके कमर्शियल ढांचे की दिशा तय करेगा। इसी वजह से वे अब इस मुद्दे पर गहन विमर्श और अतिरिक्त समय की मांग कर रहे हैं।

आर्थिक मोर्चे पर क्लबों का गणित डराने वाला है। उनके अनुसार, एक पूरे सीजन के सुचारू संचालन—जिसमें प्रोडक्शन, मार्केटिंग और खिलाड़ियों के वेतन जैसे भारी-भरकम खर्च शामिल हैं—के लिए लगभग 160 करोड़ रुपये की जरूरत होती है। वर्तमान बोलियां इस भारी खर्च के आसपास भी नहीं ठहरतीं, जिसने क्लबों की चिंता को कई गुना बढ़ा दिया है।

बैठक के बाद क्लबों ने आंतरिक चर्चा के लिए मोहलत मांगी है, ताकि वे सभी हितधारकों के साथ मिलकर एक सामूहिक और ठोस निर्णय ले सकें। अब गेंद महासंघ के पाले में है कि वह इस “उचित समय” की परिभाषा कैसे तय करता है और क्या वह तय समयसीमा के भीतर इस गतिरोध को सुलझा पाएगा।

प्रशासनिक स्तर पर पहले भी कई फैसलों में देरी देखी गई है, चाहे वह क्लबों द्वारा भुगतान की समयसीमा हो या संचालन समिति का गठन। जानकारों का मानना है कि अगर यह अनिश्चितता बरकरार रही, तो आगामी सत्र की तैयारियों पर गंभीर संकट मंडरा सकता है।

उल्लेखनीय है कि महासंघ के भीतर से भी सावधानी बरतने की आवाजें उठने लगी हैं। कुछ सदस्यों का मानना है कि चूंकि वर्तमान कार्यकाल एक सीमित अवधि के लिए है, इसलिए जल्दबाजी में लिया गया कोई भी बड़ा और दीर्घकालिक फैसला आत्मघाती साबित हो सकता है।

स्पष्ट है कि भारतीय फुटबॉल आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यहां लिया गया हर पारदर्शी और संतुलित फैसला न केवल लीग की साख बचाएगा, बल्कि इससे जुड़े हर खिलाड़ी और प्रशंसक के हितों की रक्षा भी करेगा।


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