धुसिया ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए पूछा, “क्या नियुक्तियों, नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कार्यान्वयन, यूजीसी विधेयक और शिक्षकों के निलंबन जैसे बुनियादी मुद्दों पर उठती आवाजों को दबाने की कोशिश की जा रही है?”
उन्होंने इस आदेश को वापस लेने की पुरजोर मांग करते हुए कहा कि कुलानुशासक कार्यालय इस तरह मनमाने और एकतरफा ढंग से सार्वजनिक सभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकता। दरअसल, यह सख्त रुख उन हालिया विवादों के बाद देखने को मिला है, जब पिछले हफ्ते विरोध-प्रदर्शन के दौरान छात्र गुटों में हुई झड़प के बाद दो एफआईआर दर्ज की गई थीं और 12 फरवरी को एक सामाजिक न्याय कार्यक्रम में इतिहासकार इरफान हबीब के भाषण के दौरान उन पर बाल्टी से पानी फेंकने जैसी अप्रिय घटना घटी थी।
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