क्या पर्यावरण को हाशिए पर धकेला जा रहा है? सोनिया गांधी का तीखा प्रहार
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने देश की सरकारी नीति निर्धारण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पर्यावरण के प्रति एक गहरी और लगातार उपेक्षा का रवैया अपनाया जा रहा है, जो चिंताजनक है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की दयनीय स्थिति
गांधी ने विशेष रूप से राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की कमजोर होती स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि NGT को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया है, जबकि इसकी भूमिका देश के पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण है। अब समय आ गया है कि NGT को उसके पुराने गौरवशाली स्थान पर बहाल किया जाए और उसे सरकारी नीतियों और दबाव से पूरी तरह स्वतंत्र होकर कार्य करने की अनुमति दी जाए।
“संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण” की आवश्यकता
सोनिया गांधी ने पर्यावरणीय मामलों पर अधिक अंतर-सरकारी समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में वायु प्रदूषण के गंभीर संकट का उदाहरण देते हुए कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए भूजल में यूरेनियम संदूषण जैसे मुद्दों की तरह ही एक “संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण” और क्षेत्रीय स्तर पर मिलकर काम करने की आवश्यकता है।
सहकारी संघवाद की भावना पर सवाल
उन्होंने मोदी सरकार से पर्यावरण संबंधी मामलों पर सहकारी संघवाद की भावना का प्रदर्शन करने का आग्रह किया। गांधी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की पर्यावरण नीतियों को कानून के शासन के प्रति सम्मान, स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता (उनके खिलाफ नहीं) और पर्यावरण तथा मानव विकास के बीच अटूट संबंध की गहरी समझ से निर्देशित होना चाहिए।
स्वस्थ और सुरक्षित भारत का निर्माण
कांग्रेस नेता ने अंत में कहा कि केवल ऐसे ही दृष्टिकोण के माध्यम से हम एक स्वस्थ और सुरक्षित भारत का निर्माण कर सकते हैं। यह बयान सरकार की पर्यावरण नीतियों पर एक कड़ा प्रहार है और देश के भविष्य के लिए पर्यावरण संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है।
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