नेताजी की अस्थियों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख: ‘जब वारिस आएंगे, तभी होगी सुनवाई’
याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार टोक्यो के रेनको-जी मंदिर से नेताजी की अस्थियां वापस लाने में नाकाम रही है, जिसके कारण उनकी बेटी अनीता बोस भारत में उनका सम्मानजनक अंतिम संस्कार नहीं कर पा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने टोक्यो के ऐतिहासिक रेनको-जी मंदिर से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों को भारत लाने की मांग वाली याचिका पर फिलहाल विचार करने से मना कर दिया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई तभी की जाएगी, जब नेताजी के कानूनी वारिस स्वयं अदालत के समक्ष अपनी बात रखेंगे।
पीठ ने नेताजी की महानता को नमन करते हुए कहा कि वे राष्ट्र के सबसे महान सपूतों में से एक थे, लेकिन अदालत ऐसी याचिकाओं के पीछे के समय और मंशा को बखूबी समझती है। न्यायाधीशों ने साफ कर दिया कि परिवार की भागीदारी के बिना इस तरह का आदेश नहीं दिया जाएगा। उन्होंने निर्देश दिया कि उनके वारिसों को याचिका लाने दीजिए, तभी हम विचार करेंगे। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ए.एम. सिंघवी ने बताया कि नेताजी की वर्तमान में एकमात्र जीवित वारिस उनकी बेटी अनीता बोस फाफ हैं। इस टिप्पणी के बाद याचिका को वापस ले लिया गया।
इस याचिका में केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए गए थे कि वह रेनको-जी मंदिर से अवशेषों को वापस लाने में विफल रही है, जिसके चलते उनकी बेटी अपने पिता का विधि-विधान से अंतिम संस्कार करने में असमर्थ हैं। याचिकाकर्ता की मांग थी कि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करे और सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने का आदेश दे।
विदित हो कि ये अस्थियां 18 सितंबर 1945 से टोक्यो के मंदिर में सुरक्षित रखी गई हैं, जो ताइवान में 18 अगस्त 1945 को हुए कथित विमान हादसे के बाद वहां पहुंची थीं। हालांकि, नेताजी की मृत्यु का रहस्य आज भी विवादों के घेरे में है। मुखर्जी आयोग सहित विभिन्न जांचों के परस्पर विरोधी निष्कर्षों के बीच समय-समय पर इन अवशेषों की डीएनए जांच की मांग भी उठती रही है। अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि क्या नेताजी का परिवार इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाएगा।
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