ब्रिटेन में शबाना महमूद रचेंगी इतिहास: क्या देश को मिलने वाली है पहली मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री?

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Britain में इतिहास लिखने के करीब Shabana Mahmood, बन सकती हैं देश की पहली मुस्लिम प्रधानमंत्री

ब्रिटिश राजनीति के गलियारों में इन दिनों जबरदस्त हलचल है। प्रधानमंत्री कीर स्टारमर अपने राजनीतिक करियर के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं, और इसी उथल-पुथल के बीच वेस्टमिंस्टर में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। चर्चाओं के केंद्र में हैं गृह सचिव शबाना महमूद, जिन्हें लेबर पार्टी की कमान संभालने के लिए सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा है। यदि वह इस पद पर पहुंचती हैं, तो वह यूनाइटेड किंगडम की पहली मुस्लिम प्रधानमंत्री बनकर इतिहास रच देंगी।

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स्टारमर की मौजूदा चुनौतियों का कारण कोई निजी विवाद नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चूक है। एपस्टीन फाइलों के दोबारा चर्चा में आने के संवेदनशील समय पर पीटर मैंडेलसन को पार्टी के आंतरिक नेतृत्व में वापस लाना उनके लिए आत्मघाती साबित हुआ। इससे न केवल जांच का दायरा बढ़ा, बल्कि पार्टी के भीतर भी असंतोष की लहर दौड़ गई। अब जब स्टारमर की स्थिति डगमगाती दिख रही है, तो उनके संभावित उत्तराधिकारी के रूप में शबाना महमूद का नाम प्रमुखता से उभर कर सामने आया है।

कौन हैं शबाना महमूद? साल 2010 से बर्मिंघम लेडीवुड का प्रतिनिधित्व कर रहीं महमूद को लेबर पार्टी की सबसे कुशाग्र और रणनीतिक रूप से निपुण हस्तियों में गिना जाता है। पेशे से बैरिस्टर रहीं महमूद ने उसी वर्ष संसद में कदम रखा था और वह लेबर पार्टी की पहली मुस्लिम महिला सांसदों में से एक बनीं। अपनी योग्यता के दम पर उन्होंने शैडो कैबिनेट में न्याय और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाला और पार्टी के भीतर एक अनुशासित नेता के रूप में अपनी धाक जमाई।

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लेबर पार्टी की सत्ता में वापसी के बाद 2025 में गृह सचिव का पद संभालने वाली महमूद वर्तमान में राष्ट्रीय सुरक्षा, आव्रजन और कानून-व्यवस्था जैसी सबसे कठिन चुनौतियों का सामना कर रही हैं। बर्मिंघम में पाकिस्तानी मूल के अप्रवासी परिवार में जन्मीं महमूद अक्सर अपनी पहचान, श्रमिक वर्ग की परवरिश और सफलता में शिक्षा के महत्व पर जोर देती रही हैं। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि हाल के समय में उन्होंने आव्रजन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। पिछले हफ्ते ही उन्होंने स्थायी निवास अधिकारों में बदलाव का मजबूती से बचाव करते हुए सरकार के फैसलों को “उचित” करार दिया था।


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