ईरान के साथ तनातनी के बीच ट्रंप का ‘चीन मिशन’: ताइवान और व्यापारिक युद्ध पर टिकी दुनिया की निगाहें
ईरान के साथ जारी भारी तनातनी और युद्धविराम के बावजूद वैश्विक अशांति के बीच, अमेरिका ने अब अपनी कूटनीतिक बिसात का रुख मोड़ लिया है। खबर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले हफ्ते एक महत्वपूर्ण यात्रा पर चीन जा रहे हैं। जब ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आमने-सामने मुलाकात होगी, तो सबसे बड़ा मुद्दा ‘ताइवान’ का होगा। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने व्हाइट हाउस में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान इस बड़े घटनाक्रम की पुष्टि की है। रूबियो ने स्पष्ट किया कि ताइवान हमेशा से ही दोनों महाशक्तियों के बीच बातचीत के केंद्र में रहा है और दोनों ही पक्ष जानते हैं कि इस क्षेत्र में अस्थिरता किसी के हित में नहीं है। अमेरिका का रुख साफ है—इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाला कोई भी कदम उसे स्वीकार्य नहीं है।
अब 14 और 15 मई को ट्रंप का बीजिंग दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाला है। इस दौरान शी जिनपिंग के साथ कई गंभीर मुद्दों पर चर्चा होगी, जिसमें ताइवान सबसे संवेदनशील मुद्दा माना जा रहा है। यह मुद्दा लंबे समय से दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट की मुख्य वजह रहा है।
ताइवान: लोकतंत्र और ‘वन चाइना’ की जंग
चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक प्रशासन वाला क्षेत्र घोषित करता है। अमेरिका, ताइवान का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय समर्थक और हथियारों का सप्लायर है, जो चीन की आंखों में हमेशा खटकता रहा है। चीन ने कई बार अमेरिका को इस मुद्दे पर सीधी चुनौती दी है। जब पिछले दिनों अमेरिका ईरान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था, तब चीन ने ताइवान की ओर अपनी आक्रामकता और बढ़ा दी थी। ऐसे में ट्रंप की यह यात्रा ताइवान की सुरक्षा की अमेरिकी गारंटी को दोहराने का एक बड़ा मंच बन सकती है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो 1949 की चीनी क्रांति के दौरान, कम्युनिस्टों से हारने के बाद नेशनलिस्ट (कोमेतांग) ग्रुप इसी द्वीप पर भाग कर आ गया था। तब से चीन इसे अपना अधूरा मिशन मानता है और ‘वन चाइना पॉलिसी’ के तहत इस पर कब्जा करना चाहता है। दिलचस्प बात यह है कि ताइवान के भीतर भी दो फाड़ हैं—एक धड़ा चीन के साथ विलय का समर्थक है, तो दूसरा पूर्ण स्वतंत्रता का। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ताइवान की स्थिति पेचीदा है; उसे स्वतंत्र देश के बजाय अक्सर एक ‘इकाई’ के रूप में देखा जाता है। भारत की भी वहां एम्बेसी नहीं बल्कि केवल काउंसिलेट है और ताइवान यूएनओ का सदस्य भी नहीं है। अमेरिका भी एक तरफ ‘वन चाइना पॉलिसी’ को मानता है, तो दूसरी तरफ ताइवान की संप्रभुता का पुरजोर समर्थन करता है।
रेयर अर्थ और व्यापार पर ट्रंप-जिनपिंग की संभावित चर्चा
शी जिनपिंग के साथ अपनी आगामी बैठक में डोनाल्ड ट्रंप व्यापारिक रिश्तों के साथ-साथ ‘दुर्लभ मृदा खनिजों’ (रेयर अर्थ मिनरल्स) का अहम मुद्दा उठा सकते हैं। अमेरिकी टेक इंडस्ट्री के लिए ये खनिज रीढ़ की हड्डी के समान हैं और चीन के बढ़ते एकाधिकार ने वाशिंगटन की नींद उड़ा दी है। ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वह इस मोर्चे पर चीन को खुली छूट देने के मूड में नहीं हैं।
भारत के लिए इस बैठक के मायने
बीजिंग में होने वाली इस शीर्ष स्तरीय वार्ता पर नई दिल्ली की भी पैनी नजर रहेगी। अमेरिका और चीन, दोनों ही भारत की विदेश नीति के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, इसलिए वहां लिया गया कोई भी फैसला सीधे तौर पर भारत को प्रभावित करेगा। भारत के लिए चीन हमेशा से एक बड़ी सुरक्षा चुनौती और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहा है, खासकर तब जब वह पाकिस्तान जैसे भारत विरोधी देशों का साथ देता है। कूटनीतिक मंचों पर शांति की बातें करने वाला चीन, असल में हर तरफ से भारत की घेराबंदी (स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स) करने और दबाव बनाने की कोशिशों में जुटा रहता है। ऐसे में ट्रंप का चीन दौरा भारत के रणनीतिक समीकरणों के लिए भी बेहद खास होगा।
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