पाकिस्तान के संवैधानिक संशोधन: संयुक्त राष्ट्र की चिंता, न्यायपालिका पर खतरा?
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने पाकिस्तान में हाल ही में अपनाए गए संवैधानिक संशोधनों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि ये संशोधन, विशेषकर 26वें संशोधन की तरह, न्यायिक स्वतंत्रता को गंभीर रूप से कमजोर करते हैं।
यूएन की मुख्य चिंताएं क्या हैं?
टर्क ने एक वीडियो बयान में स्पष्ट किया कि नवीनतम संवैधानिक बदलावों को भी, पहले के 26वें संशोधन की तरह, कानूनी समुदाय और पाकिस्तानी जनता के साथ किसी भी व्यापक चर्चा के बिना जल्दबाजी में पारित किया गया है। उनके अनुसार, इन संशोधनों का एक साथ प्रभाव यह हो सकता है कि न्यायपालिका पर राजनीतिक हस्तक्षेप और कार्यकारी नियंत्रण बढ़ जाए। उन्होंने सैन्य जवाबदेही और कानून के शासन के सम्मान को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई हैं। टर्क ने चेतावनी दी है कि इन संशोधनों के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जो पाकिस्तान के लोगों द्वारा बेहद सराहे जाने वाले लोकतंत्र और कानून के शासन के सिद्धांतों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
पाकिस्तान के नए संशोधन क्या कहते हैं?
पाकिस्तान ने 13 नवंबर को नए संवैधानिक बदलावों को मंजूरी दी है। मुख्य परिवर्तनों में शामिल हैं:
- न्यायिक शक्ति में बदलाव (27वां संशोधन): इसके तहत, एक नया फेडरल कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट स्थापित किया गया है, जो अब संवैधानिक मामलों की सुनवाई करेगा। इससे सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां कम हो गई हैं, और वह अब मुख्य रूप से सिविल और क्रिमिनल मामलों पर ध्यान केंद्रित करेगा।
- चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) का पद: सेना प्रमुख असीम मुनीर देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज बन गए हैं। इस बदलाव से तीनों सेनाओं का पूरा नियंत्रण राष्ट्रपति और कैबिनेट से CDF के हाथों में आ गया है।
- आपराधिक मामलों से छूट: 27वें संशोधन के अनुसार, राष्ट्रपति, फील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ द एयर फोर्स और एडमिरल ऑफ द फ्लीट को आपराधिक मामलों और गिरफ्तारी से आजीवन छूट प्रदान की गई है।
संवैधानिक संशोधन के खिलाफ विरोध
पिछले हफ्ते, पाकिस्तान की मानवाधिकार परिषद ने भी इन संशोधनों का कड़ा विरोध किया था। परिषद ने कराची प्रेस क्लब के बाहर 27वें संवैधानिक संशोधन के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रही अपनी सदस्य फरवा असकर और पत्रकार अलिफिया सोहेल की “गैर-कानूनी गिरफ्तारी और पांच घंटे की हिरासत” की निंदा की थी।
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