वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव की गूंज: ब्रिक्स देशों ने फूंका सुधारों का शंखनाद
ब्रिक्स नेताओं ने वैश्विक मंच पर अपनी ताकत दिखाते हुए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए अधिक भागीदारी की पुरजोर मांग की है। समूह ने एकतरफा शुल्क, व्यापारिक बाधाओं और आर्थिक प्रतिबंधों की तीखी आलोचना करते हुए वैश्विक वित्तीय ढांचे में व्यापक कायापलट का आह्वान किया है। ‘नयी दिल्ली घोषणापत्र’ के जरिए ब्रिक्स ने साफ कर दिया कि बढ़ता संरक्षणवाद और एकतरफा व्यापारिक उपाय वैश्विक व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा हैं।
व्यापारिक संरक्षणवाद पर कड़ा प्रहार
समूह ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मौजूदा हालातों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा, “हम एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों में हो रही वृद्धि को लेकर गंभीर हैं। ये कदम न केवल व्यापार को विकृत करते हैं, बल्कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के तय मानदंडों के भी खिलाफ हैं।” ब्रिक्स ने चेतावनी दी है कि ऐसे प्रतिबंधात्मक कदमों से वैश्विक व्यापार सिमट सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों में अनिश्चितता का माहौल पैदा होगा। डब्ल्यूटीओ आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था का समर्थन करते हुए समूह ने इसके ‘विवाद निपटान तंत्र’ को तत्काल बहाल करने की मांग की। घोषणापत्र के अनुसार, एक पारदर्शी और प्रभावी ‘दो-स्तरीय बाध्यकारी विवाद निपटान तंत्र’ ही वैश्विक व्यापार में भरोसे और पूर्वानुमान का आधार बन सकता है। साथ ही, डब्ल्यूटीओ की अपीलीय संस्था में नए सदस्यों की नियुक्ति में हो रही देरी को खत्म करने पर भी जोर दिया गया।
आर्थिक प्रतिबंधों और मानवाधिकारों पर रुख
ब्रिक्स ने इथियोपिया और ईरान के डब्ल्यूटीओ में शामिल होने के प्रयासों को अपना समर्थन दिया और 53 अफ्रीकी देशों के लिए चीन की ‘शून्य-शुल्क व्यवस्था’ की सराहना की। इसके साथ ही, समूह ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन में लगाए जाने वाले ‘एकतरफा आर्थिक और द्वितीयक प्रतिबंधों’ की कड़ी निंदा की। घोषणापत्र में स्पष्ट कहा गया कि बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के लगाए गए ऐसे प्रतिबंध लक्षित देशों की आम जनता के मानवाधिकारों, स्वास्थ्य, विकास और खाद्य सुरक्षा पर बेहद नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। ऐसे उपायों को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के विरुद्ध बताते हुए इन्हें समाप्त करने की मांग की गई है।
ब्रेटन वुड्स संस्थानों में सुधार की अनिवार्यता
ब्रिक्स ने ब्रेटन वुड्स संस्थानों (मुख्यतः आईएमएफ और विश्व बैंक) की कार्यप्रणाली में आमूल-चूल बदलाव की आवश्यकता रेखांकित की। समूह का तर्क है कि इन संस्थानों के शासन में वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं का प्रतिबिंब दिखना चाहिए। इसके लिए नेतृत्व चयन की प्रक्रिया को केवल शक्ति-केंद्रित न रखकर उसे योग्यता आधारित, समावेशी और पारदर्शी बनाने की मांग की गई है, ताकि क्षेत्रीय विविधता और विकासशील देशों की आवाज को मजबूती मिल सके।
कोटा और भविष्य की राह
‘ब्रिक्स रियो डी जेनेरियो विजन’ का समर्थन करते हुए समूह ने आईएमएफ को एक मजबूत और पर्याप्त वित्तपोषित संस्था बनाए रखने की वकालत की। आईएमएफ के कोटा की 16वीं सामान्य समीक्षा को जल्द लागू करने और 17वीं समीक्षा के तहत कोटा ढांचे में सार्थक बदलाव करने पर जोर दिया गया। ब्रिक्स का मानना है कि कोटा में बदलाव से उभरते बाजारों की मतदान हिस्सेदारी बढ़नी चाहिए, लेकिन इसका आर्थिक बोझ गरीब देशों पर नहीं पड़ना चाहिए। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी देश का स्वैच्छिक वित्तीय योगदान उसके कोटा या वोटिंग अधिकारों को प्रभावित नहीं करना चाहिए। विश्व बैंक के संदर्भ में समूह ने उम्मीद जताई कि 2025 की शेयरधारिता समीक्षा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के कम प्रतिनिधित्व की कमी को दूर कर संस्था को और सशक्त बनाएगी।
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