चार महाद्वीपों पर NMDC की हुंकार: लिथियम और कॉपर माइनिंग में बड़े निवेश की तैयारी

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चार महाद्वीपों पर NMDC की हुंकार: लिथियम और कॉपर माइनिंग में बड़े निवेश की तैयारी
चार महाद्वीपों में NMDC की नजर, लिथियम और कॉपर खनन में उतारेगी पूंजी

(अभिषेक सोनकर)
नयी दिल्ली, 25 अक्टूबर: भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज खनन कंपनी एनएमडीसी (NMDC) अब अपनी पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर एक बड़े वैश्विक बदलाव की तैयारी में है। कंपनी ने अब केवल ‘लौह अयस्क’ तक सीमित न रहकर चार महाद्वीपों—दक्षिण अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक—अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मेगा प्लान तैयार किया है। एनएमडीसी की नजरें अब लिथियम, तांबा और कोबाल्ट जैसे उन महत्वपूर्ण खनिजों पर टिकी हैं, जिन्हें भविष्य की अर्थव्यवस्था का आधार माना जा रहा है।

इस रणनीतिक विस्तार का मुख्य उद्देश्य वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे तेजी से उभरते उद्योगों की कच्चे माल की जरूरतों को पूरा करना है। उद्योग जगत के सूत्रों के अनुसार, एनएमडीसी फिलहाल चिली, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, ब्राजील और एशिया के विभिन्न हिस्सों में लिथियम और कोबाल्ट जैसे रणनीतिक खनिजों के भंडार तलाश रही है। इसके साथ ही, कंपनी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ओमान, भूटान और ऑस्ट्रेलिया में चूना पत्थर, कोकिंग कोल और टंगस्टन जैसे संसाधनों के लिए भी नए ब्लॉक की खोज में जुटी है।

वर्तमान में, एनएमडीसी भारत की लौह अयस्क मांग का लगभग एक-चौथाई हिस्सा अकेले पूरा करती है। हालांकि, भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए कंपनी अब अपनी एकल निर्भरता को कम करना चाहती है। वर्तमान में कंपनी का 99.9 प्रतिशत राजस्व लौह अयस्क से आता है, लेकिन नया लक्ष्य इस समीकरण को बदलना है। कंपनी की योजना है कि भविष्य में उसके कुल राजस्व का कम से कम 20 प्रतिशत हिस्सा गैर-लौह खनिजों की बिक्री से आए।

कंपनी का कहना है, “फिलहाल हमारा पूरा कारोबार लौह अयस्क पर टिका है, लेकिन हमारा लक्ष्य देश के तेजी से बढ़ते औद्योगिक क्षेत्र की हर खनिज जरूरत को पूरा करना है।” एनएमडीसी के चेयरमैन अमिताव मुखर्जी ने भी इस विविधीकरण की पुष्टि करते हुए कहा कि कंपनी का लक्ष्य देश की सबसे बड़ी और विविधतापूर्ण खनन शक्ति बनना है।

यह महत्वाकांक्षी कदम केंद्र सरकार की उन नीतियों के बिल्कुल अनुकूल है, जिनका उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाना और आयात पर निर्भरता कम करना है। विशेषकर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और बैटरी निर्माण के लिए लिथियम और कोबाल्ट की उपलब्धता अनिवार्य है। इस्पात मंत्रालय के ‘नीति दृष्टिकोण 2047’ के मुताबिक, स्टील उत्पादन की कुल लागत में कच्चे माल की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत तक होती है, जिसे कम करने के लिए घरेलू खनन और विदेशी संपत्तियों का अधिग्रहण जरूरी है।

सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और पीएलआई (PLI) जैसी योजनाओं के चलते देश में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों में भारी उछाल आने की उम्मीद है। ऐसे में एनएमडीसी की यह नई वैश्विक दौड़ न केवल वाहन और इंजीनियरिंग क्षेत्र को मजबूती देगी, बल्कि रक्षा और जहाज निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी भारत के बढ़ते कदमों को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करेगी।


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