सेंसरशिप के चुभते कांटों के बीच ‘जॉली एलएलबी 3’ का न्यायसंगत उदय: एक बार फिर कोर्टरूम में गूंजेगी सच की आवाज़
जब सत्ता के अदृश्य हाथ रचनात्मकता की डोरियों को कसने लगते हैं, तो फिल्मकार दोराहे पर खड़े होते हैं: या तो वे इन बंधनों में बंध जाते हैं, या फिर उन्हें तोड़कर एक नया रास्ता बनाते हैं। सुभाष कपूर, व्यंग्य की तीखी मिठास को बड़े पर्दे पर पिरोने में माहिर, इस बार हमें सीधे 2011 के भट्टा पारसौल भूमि अधिग्रहण आंदोलन की ओर ले चलते हैं। यह वही आंदोलन था जिसने ‘जॉली एलएलबी’ की पहली कड़ी के लिए प्रेरणा का काम किया था और विकास की दिशा को नए सिरे से परिभाषित करने पर मजबूर किया था। ‘जॉली एलएलबी’ (2013) और ‘जॉली एलएलबी 2’ (2017) के दर्शक, जिन्होंने सामाजिक संदेशों और दिल को छू लेने वाले हास्य के मेल का आनंद लिया था, यह देखकर आश्चर्यचकित हैं कि ‘जॉली एलएलबी 3’ भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही एक सामाजिक संदेश के इर्द-गिर्द बुनी गई है। लेकिन इस बार, लड़ाई सिर्फ़ अदालत के तर्कों तक सीमित नहीं है; यह नैतिकता, लालच, धन की शक्ति और गरीबी की मार्मिक वास्तविकता के बीच एक गहरा संघर्ष है।
कहानी का ताना-बाना: न्याय की तलाश में भटकते दो ‘जॉली’
‘जॉली एलएलबी 3’ का सफर हमें राजस्थान के बीकानेर जिले के एक शांत गांव में ले जाता है। यहां, एक महत्वाकांक्षी और धनी व्यापारी, हरिभाई खेतान (गजराज राव), अपने विशाल ड्रीम प्रोजेक्ट ‘बीकानेर टू बोस्टन’ को साकार करने के लिए बेताब है। इस प्रोजेक्ट की भव्यता इतनी है कि उसे स्थानीय किसानों की उपजाऊ जमीन की सख्त जरूरत है। लेकिन जब किसान अपनी पुरखों की जमीन छोड़ने को तैयार नहीं होते, तो हरिभाई खेतान अपनी पहुंच और प्रभाव का इस्तेमाल करता है। वह स्थानीय राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और अपने रुतबे का फायदा उठाकर किसानों को बरगलाता है और धोखे से जमीन अपने नाम करवा लेता है।
इस बीच, कहानी एक ऐसी मोड़ पर आ जाती है जहां एक गरीब किसान, अत्यधिक दबाव और हताशा में, अपनी जान गंवा बैठता है। उसकी विधवा, जानकी (सीमा बिस्वास), न्याय की एक किरण की तलाश में दर-दर भटकती है। आखिरकार, वह दोनों ‘जॉली’ – अरशद वारसी और अक्षय कुमार – के पास पहुंचती है। हालांकि, शुरुआत में दोनों ही इस जटिल और संवेदनशील मामले में उलझने से कतराते हैं। पर जैसे-जैसे उन्हें इस अन्याय की भयावह सच्चाई का पता चलता है, वे अपने मतभेदों को भुलाकर एक हो जाते हैं और इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का दृढ़ निश्चय करते हैं।
फिल्म का मिजाज और पटकथा की बुनावट: हँसी, आँसू और संतुलन का खेल
‘जॉली एलएलबी 3’ का पहला भाग दर्शकों को हल्के-फुल्के अंदाज में हंसाता है। इसमें हास्य, शरारतें और अदालत के बाहर की मजेदार नोक-झोंक भरपूर है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह अधिक भावुक और गंभीर हो जाती है, जिससे फिल्म का मूल स्वर बदल जाता है। यह किसानों की दयनीय स्थिति और सामाजिक न्याय की महत्ता पर गहराई से प्रकाश डालती है। फिल्म के पहले हाफ में अक्षय कुमार और अरशद वारसी के बीच की जुबानी जंग बेहद मनोरंजक है। उनकी तेज-तर्रार बहसें और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखती हैं। जज त्रिपाठी के रूप में सौरभ शुक्ला की वापसी एक बार फिर यादगार है। अपने खास अंदाज और पंचलाइन से वे हर दृश्य में चार चांद लगा देते हैं, और उनकी संवाद अदायगी देखने लायक है।
हालांकि, पहले भाग में कोर्टरूम ड्रामा थोड़ा कमजोर महसूस होता है। कहानी का एक बड़ा हिस्सा अदालत के बाहर की घटनाओं पर केंद्रित है, जो कभी-कभी थोड़ी धीमी गति पकड़ लेती है। इसके विपरीत, फिल्म का दूसरा भाग पूरी तरह से गंभीर हो जाता है, जो ‘जॉली एलएलबी’ श्रृंखला की पिछली कड़ियों के अंदाज को बरकरार रखता है। किसानों का दर्द और व्यवस्था की खामियां दिल को छू जाती हैं। फिर भी, कोर्टरूम की नाटकीयता पहली दो किश्तों जितनी प्रभावशाली नहीं है।
अभिनय का दमखम: ‘जॉली एलएलबी 3’ में कौन बिखेरे ज़्यादा रंग?
यह सवाल अक्सर उठता है कि ‘जॉली एलएलबी’ की दोनों फिल्मों में से कौन ज़्यादा प्रभावशाली है। इस बार, अक्षय कुमार बाजी मार ले जाते हैं। उन्हें ज़्यादा स्क्रीन स्पेस मिला है और उनकी उपस्थिति अरशद वारसी पर भारी पड़ती है। हालांकि, ‘जॉली एलएलबी’ के अभिनेता का किरदार ज़्यादा गंभीर और संवेदनशील है, जो कभी-कभी उनके अभिनय को थोड़ा अटपटा बना देता है।
दोनों अभिनेत्रियां, अमृता राव और हुमा कुरैशी, को पर्दे पर बहुत कम समय मिला है। फिल्म के समाज और रिश्तों पर केंद्रित होने के कारण, उन्हें और बेहतर तरीके से चित्रित किया जा सकता था।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका शानदार अभिनय है। अक्षय कुमार एक बार फिर कोर्टरूम ड्रामा और सामाजिक फिल्मों में अपनी सहजता का लोहा मनवाते हैं। उनकी संवाद अदायगी, हाव-भाव और कॉमिक टाइमिंग लाजवाब हैं। अरशद वारसी, जिनसे दर्शक हास्य की उम्मीद करते हैं, इस बार एक गंभीर वकील के रूप में न्याय की राह पर चलते हैं, लेकिन फिल्म का लहजा उन्हें कभी-कभी दबा हुआ महसूस कराता है।
सौरभ शुक्ला, हमेशा की तरह, जज की भूमिका में उत्कृष्ट हैं। उनका हास्य, कोर्टरूम में उनकी सहजता और उनके संवाद फिल्म को खास बनाते हैं। सीमा बिस्वास, थोड़े संवादों के बावजूद, अपने अभिनय से दिल जीत लेती हैं। उनकी आँखों में उदासी और लाचारी साफ झलकती है। गजराज राव, जिन्हें अक्सर सकारात्मक या हास्य भूमिकाओं में देखा जाता है, इस बार एक खलनायक की भूमिका में हैं। हालांकि उन्होंने अपना काम अच्छे से किया है, लेकिन उनके व्यक्तित्व में खलनायक वाला असर थोड़ा कम है।
गजराज राव के खिलाफ वकील के रूप में राम कपूर बेहद प्रभावशाली हैं। अदालत में अक्षय कुमार के खिलाफ उनकी दलीलें देखने लायक हैं।
‘जॉली एलएलबी 3’ का सामाजिक आईना: व्यवस्था पर तीखा प्रहार
‘जॉली एलएलबी 3’ सिर्फ़ एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं है; यह व्यवस्था की विफलताओं और आम आदमी के लिए न्याय पाने में आने वाली कठिनाइयों को उजागर करती है। फिल्म में किसान आत्महत्या और भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील मुद्दों को बड़ी ही बारीकी से दर्शाया गया है। ‘जॉली एलएलबी 3’ यह साबित करने की कोशिश करती है कि कानूनी लड़ाई सिर्फ़ कागजी कार्रवाई और बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भावनाएं, संघर्ष और मानवता की अनगिनत परतें छिपी होती हैं।
यह भले ही सर्वश्रेष्ठ कोर्टरूम ड्रामा न हो, लेकिन यह निश्चित रूप से साबित करता है कि यह फ्रैंचाइज़ी आज भी क्यों प्रासंगिक है। ‘जॉली एलएलबी 3’ आपको एक ही समय में हंसाती है, सोचने पर मजबूर करती है और अंत में एक संतोष की भावना देती है।
फ़िल्म का नाम: जॉली एलएलबी 3
आलोचकों की रेटिंग: 3/5
रिलीज़ की तारीख: 19 सितंबर, 2025
निर्देशक: सुभाष कपूर
शैली: कोर्टरूम-ड्रामा
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