‘जटाधारा’: आस्था, विज्ञान और अध्यात्म का एक रोंगटे खड़े कर देने वाला संगम!
क्या आपने कभी ऐसी फिल्म देखी है जो आपको आस्था, विज्ञान और अध्यात्म के अनूठे मेल में डुबो दे? ‘जटाधारा’ यही अनुभव लेकर आई है, और यकीन मानिए, यह आज के उस सिनेमाई परिदृश्य में एक ताज़ी हवा का झोंका है जहाँ अक्सर फ़िल्में महज़ डर या ड्रामा तक सीमित रह जाती हैं। ‘जटाधारा’ इन सीमाओं को तोड़कर दर्शकों को कुछ ऐसा परोसती है जो सोचने पर मजबूर करता है। आखिर कैसी है यह फिल्म? आइए, जानते हैं अपनी इस खास रिपोर्ट में।
फिल्म की कहानी की जड़ें अनंत पद्मनाभस्वामी मंदिर के सदियों पुराने रहस्यों में गहराई तक धँसी हुई हैं। लेकिन ‘जटाधारा’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें इस्तेमाल किए गए तांत्रिक मंत्रों और रीति-रिवाजों को शूटिंग के दौरान सचमुच निभाया गया था – कुछ ऐसा जो शायद ही आपको सिनेमा जगत में देखने को मिलता है! फिल्म की शुरुआत से ही एक अनूठा, रहस्यमय माहौल बुनना शुरू हो जाता है। मंदिर की अंधेरी गलियां, दीयों की झिलमिलाती रोशनी और दूर से आती मंत्रों की गूँज, यह सब मिलकर श्रद्धा और डर का एक ऐसा सम्मोहक मिश्रण तैयार करते हैं जो दर्शकों को अपनी सीटों से बांधे रखता है। दोनों ही निर्देशकों ने इस जटिल विषय को बेमिसाल संवेदनशीलता और आत्मविश्वास के साथ पर्दे पर उतारा है।
वेंकट कल्याण द्वारा लिखी गई यह कहानी एक रहस्यमयी विधि, ‘पिशाचा बंधनम्’, के इर्द-गिर्द घूमती है। इस विधि के द्वारा आत्माओं को मंदिर के गुप्त खजाने की रक्षा के लिए बांध दिया जाता है। यह विचार भारतीय पौराणिक कथाओं को एक आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ता है। साईं कृष्ण करण और श्याम बाबू मेरीगा के लिखे डायलॉग सीधे दिल की गहराई में उतर जाते हैं। यहाँ सरल शब्दों में, पर गहरे अर्थों वाली बातें कही गई हैं।
सुधीर बाबू ने ‘शिवा’ के किरदार में जान डाल दी है। वह एक घोस्ट हंटर हैं, जिनका विश्वास केवल विज्ञान में है, लेकिन हालात उन्हें ऐसी शक्तियों के सामने खड़ा कर देते हैं जिन्हें समझना मुश्किल है। उनका सफर अविश्वास से शुरू होकर आस्था तक पहुँचता है, और यही फिल्म की आत्मा है। सुधीर की एक्टिंग में गजब का संतुलन है; उनके एक्शन सीन हों या इमोशनल पल, दोनों ही बेहद असरदार हैं। सोनाक्षी सिन्हा ने तेलुगु सिनेमा में धमाकेदार एंट्री मारी है। ‘धन पिशाची’ के किरदार में वह एक ऐसी आत्मा हैं जो लालच और दर्द के बीच फंसी हुई है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस लाजवाब है, और जब वह अपने दिव्य राक्षसी रूप में आती हैं, तो वह दृश्य इतना शक्तिशाली होता है कि आप अपनी नज़रें हटा ही नहीं पाते। यह दृश्य डरावना भी है और बेहद खूबसूरत भी।
दिव्या खोसला अपने किरदार ‘सितारा’ में सादगी और आकर्षण भरती हैं। शिल्पा शिरोडकर और इंदिरा कृष्णा कहानी को भावनात्मक गहराई देती हैं, वहीं राजीव कनकाला, रवि प्रकाश और सुभालेखा सुधाकर जैसे अनुभवी कलाकार कहानी को खूबसूरती से जोड़े रखते हैं। फिल्म के एक्शन सीन सिर्फ लड़ाई नहीं हैं, बल्कि वे किसी आध्यात्मिक अनुष्ठान जैसे लगते हैं। सुधीर बाबू के घोस्ट-हंटिंग सीन, हथियारों का मुकाबला और खून पीने वाले दृश्यों को बड़ी बारीकी से फिल्माया गया है।
समीर कल्याणी का कैमरा वर्क फिल्म की जान है। मंदिर की बनावट, दीयों की रोशनी, धुएं की परतें – हर फ्रेम एक पेंटिंग की तरह जीवंत हो उठता है। विजुअल इफेक्ट्स भी प्रभावशाली हैं, खासकर ‘धन पिशाची’ के रूप के सामने आने पर, जहाँ दृश्य आपको डराता भी है और मोहित भी करता है। फिल्म का साउंड डिज़ाइन रोंगटे खड़े कर देने वाला है। हर मंत्र, हर सन्नाटा कहानी में तनाव बढ़ाता है। राजीव राज का संगीत पारंपरिक रागों और इलेक्ट्रॉनिक धुनों का एक खूबसूरत संगम है। क्लाइमेक्स का बैकग्राउंड म्यूजिक रोमांच पैदा करता है। “शिवा स्तोत्रम” और “पल्लो लटके अगेन” जैसे गानों में ऊर्जा और भक्ति दोनों का मिश्रण है। कोरियोग्राफर संदीप ने पारंपरिक नृत्य मुद्राओं को सिनेमाई अंदाज में पिरोया है – खासकर दिव्या खोसला का टेंपल डांस बेहद खूबसूरत है।
ज़ी स्टूडियोज और प्रेरणा अरोड़ा द्वारा प्रोड्यूस की गई यह फिल्म महज़ भूत-प्रेत की कहानी नहीं है। यह इंसान और ईश्वर के बीच की जंग है, जहाँ विज्ञान सवाल पूछता है और आस्था जवाब देती है। अगर आप कुछ अलग, गहरा और अर्थपूर्ण देखना चाहते हैं, तो ‘जटाधारा’ इस हफ्ते का सबसे बेहतरीन विकल्प है।
फिल्म: जटाधारा
निर्देशक: वेंकट कल्याण और अभिषेक जायसवाल
लेखक: वेंकट कल्याण
मुख्य कलाकार: सुधीर बाबू, सोनाक्षी सिन्हा, दिव्या खोसला, शिल्पा शिरोडकर और इंदिरा कृष्णा
रेटिंग: 3.5/5
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
