बिहार का दंगल: मोदी-शाह की जोड़ी पर दांव, क्या सत्ता विरोधी लहर पर भी चलेगी जादूगरी?
विक्रम उपाध्याय
बिहार विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है, और यह महज़ एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षा है। जिस तरह से घरेलू और बाहरी मोर्चे पर चुनौतियों का अंबार लगा है और विपक्ष एनडीए को घेरने का कोई मौका नहीं चूक रहा, ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस भंवर से कैसे निकलती है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता और वैश्विक दबाव के सामने सरकार की अडिगता पर दुनिया जहाँ एक ओर आश्चर्यचकित है और भारत पर गर्व कर रही है, वहीं यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या प्रधानमंत्री बिहार के मतदाताओं के दिलो-दिमाग पर भी वही जादू चला पाएंगे?
2014 से लेकर आज तक का बीजेपी का सफर निर्विवाद रूप से ‘मोदी युग’ के नाम से जाना जाता है। यह केवल इसलिए नहीं कि बीजेपी केंद्र में सत्तासीन है, बल्कि इसलिए भी कि विश्व स्तर पर भारत की पहचान अब प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे से होने लगी है। विश्व पटल पर भारत को जानने वाले लोग, अनजाने में ही सही, प्रधानमंत्री मोदी को भी पहचानते हैं। यह विशाल व्यक्तित्व किसी जादू की छड़ी का परिणाम नहीं, बल्कि अथक परिश्रम, योग्य टीम का निर्माण और श्रेष्ठ परिणाम के लिए ठोस योजना का जीवंत प्रमाण है। 75 वर्ष की आयु में भी, मोदी 50 वर्षों से अधिक समय से इन्हीं सिद्धांतों को पोषित, विकसित और क्रियान्वित कर रहे हैं।
संघ और संगठन, प्रधानमंत्री मोदी के मूल में रचे-बसे हैं। जब भी बीजेपी ने उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंपी, उन्होंने इन्हीं दो स्तंभों के बल पर सफलता के झंडे गाड़े। राजनीतिक जीवन में, उन्होंने विश्वास बहाली का एक अभूतपूर्व प्रयोग किया है। जहाँ अधिकांश बड़े राजनेता किसी को अपना राजदार नहीं बनाते और न ही अपने से अधिक किसी पर भरोसा करते हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी में लोगों के विश्वास को जीतना और बनाए रखना एक अद्भुत कौशल है। 1985 से 1990 के बीच, जब गुजरात में संघ और भाजपा ने नरेंद्र मोदी का पहला अग्नि-परीक्षण किया, तब भाजपा गुजरात में तीसरे स्थान पर काबिज थी।
आपदा में अवसर तलाशने की कला का प्रदर्शन नरेंद्र मोदी ने यहीं पहली बार किया, और यहीं अमित शाह, मोदी के एक मजबूत साथी के रूप में उभरे। 1987 में गुजरात ने भीषण सूखे का सामना किया, तब कांग्रेस की सरकार थी और जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। नरेंद्र मोदी, तब गुजरात भाजपा के महासचिव थे। उन्होंने पूरे प्रदेश का दौरा किया, कांग्रेस सरकार की विफलताओं को उजागर किया और गुजरात में ‘न्याय यात्रा’ निकाली। इस यात्रा में अमित शाह भी उनके साथ थे। शाह, नरेंद्र मोदी से इस बात से अत्यधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने छोटे से छोटे कार्यकर्ता में नेतृत्व की भावना कैसे जागृत की। सभी एकजुट हुए, और इसी सामूहिक ऊर्जा के साथ 1995 के चुनावों में भाजपा ने अभूतपूर्व छलांग लगाई और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। यहीं से नरेंद्र मोदी की रणनीतिक समझ और अमित शाह की संगठनात्मक क्षमता का लोहा दुनिया ने माना।
बिहार से पहले, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पार्टी के लिए सफलता की कई गाथाएं रची हैं। लोकसभा चुनावों में अपेक्षा से कम परिणाम आने पर कुछ आलोचकों ने ‘मोदी युग’ के ढलान पर होने का अनुमान लगाया था, लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के परिणाम आने पर, एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के जयकारे गूंज उठे। अब, बिहार चुनावों से पहले, वही प्रश्न फिर से खड़ा है: क्या बिहार में भी हरियाणा की पुनरावृत्ति होगी? इस प्रश्न का पूर्ण उत्तर तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही मिलेगा, लेकिन चुनौतियों का सामना करने की तैयारी भाजपा में अभी से ही दिख रही है। प्रधानमंत्री मोदी अपनी योजनाओं और बिहार के लिए खजाने खोलने को प्राथमिकता दे रहे हैं, वहीं गृह मंत्री अमित शाह रणनीतियां बनाने और किसी भी कमी को पूरा करने में जुट गए हैं।
संगठनात्मक कमजोरियों को पहचानना और उन्हें दूर करने में गृह मंत्री अमित शाह की विशेषज्ञता को अब कोई झुठला नहीं सकता। अमित शाह यह कार्य वर्षों से अनवरत कर रहे हैं। गुजरात में उन्होंने भाजपा के लिए जो मजबूत आधारशिला रखी, उसी बदौलत पार्टी दो दशकों से अधिक समय से सत्ता में बनी हुई है। यही भूमिका उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश में भी निभाई। उन्होंने गुजरात मॉडल को देशव्यापी पहचान दिलाई और चुनावों के नतीजों को पार्टी के पक्ष में मोड़ा। उत्तर प्रदेश के प्रभारी के रूप में, उन्होंने नरेंद्र मोदी के काम को घर-घर तक पहुंचाया और अभूतपूर्व सफलता हासिल की। भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 71 सीटें जीतीं। लोकसभा चुनावों के इस माहौल का असर 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर भी पड़ा, जहाँ भाजपा ने सरकार बनाई।
बिहार में, प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के लिए चुनौतियाँ थोड़ी भिन्न हैं। हालांकि धरातल पर कोई स्पष्ट सत्ता विरोधी लहर दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन अमित शाह अत्यंत सजग हैं। बिहार चुनावों के लिए मुद्दे और नारे अमित शाह की टीम ने अंतिम रूप दे दिए हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाने और पाकिस्तान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने जैसे मुद्दों के साथ, भाजपा देशव्यापी जातिगत सर्वेक्षण को भी चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा बनाएगी। प्रधानमंत्री मोदी अगले पांच वर्षों में बिहार के विकास का विस्तृत खाका जनता के सामने पेश करेंगे।
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