रायपुर साहित्य महोत्सव 2026: पुरखौती मुक्तांगन में साहित्य और संस्कृति का भव्य ‘महाकुंभ’ शुरू
India
-Oneindia Staff
Published: Friday, January 23, 2026, 16:01 [IST]
नवा रायपुर स्थित ऐतिहासिक पुरखौती मुक्तांगन परिसर आज से महज तीन दिवसीय उत्सव नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बुनियाद का ‘महाकुंभ’ बनकर उभरा है। रायपुर साहित्य उत्सव 2026 का भव्य उद्घाटन आज हुआ, जिसकी चमक राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश की मौजूदगी और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता से और निखर उठी। विनोद कुमार शुक्ल मंडप में आयोजित इस समारोह में उपमुख्यमंत्री अरुण साव, वर्धा की कुलपति डॉ. कुमुद शर्मा और रंगकर्मी मनोज जोशी ने विशिष्ट अतिथि के रूप में शिरकत कर कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
समारोह का शुभारंभ छत्तीसगढ़ राज्य के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में प्रकाशित स्मारक पुस्तिकाओं के विमोचन के साथ हुआ। स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल को नमन करते हुए उपसभापति हरिवंश ने कहा कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। उन्होंने इसे आशा और चेतना का माध्यम बताते हुए कहा, “एक पुस्तक और एक लेखक भी दुनिया को बदलने की शक्ति रखते हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत की विकास यात्रा में साहित्य की सशक्त भूमिका रही है, जिसने समाज को नई दिशा दी है।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस आयोजन को “साहित्य का महाकुंभ” करार दिया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़, प्रभु राम का ननिहाल है, और यहां देशभर के 120 से अधिक ख्यातिप्राप्त लेखक 42 सत्रों में समकालीन मुद्दों पर विमर्श करेंगे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की तुलना ‘समुद्र मंथन’ से की और कहा कि जिस तरह मंथन से विष और अमृत दोनों निकले, वैसे ही अपने कष्टों के बावजूद क्रांतिकारियों ने आजादी का अमृत दिया। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी और माधवराव सप्रे जैसे साहित्यकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि कविता अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध करना सिखाती है।
मुख्यमंत्री ने दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को याद करते हुए कहा कि अमृतकाल में युवाओं की भागीदारी यह साबित करती है कि प्रदेश में साहित्यिक वातावरण उज्ज्वल है। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि कवि-हृदय नेताओं ने करोड़ों को प्रेरित किया। इस दौरान उन्होंने सुरेंद्र दुबे को भी श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने बसंत पंचमी के पावन अवसर पर इस उत्सव को साहित्य का महाकुंभ बताया। वहीं, डॉ. कुमुद शर्मा ने साहित्य को आत्मबोध और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम बताते हुए अमृतकाल में आत्मनिर्भर भारत के संकल्प पर जोर दिया। उद्घाटन के बाद लेखकों और वक्ताओं ने विभिन्न सत्रों में समकालीन साहित्य, संस्कृति और लोकतंत्र पर अपने विचार साझा किए, जिससे यह उत्सव साहित्यिक संवाद और सांस्कृतिक चेतना के विस्तार का एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
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