यहाँ पेश है उस आर्टिकल का एक नया, आकर्षक और विश्लेषणात्मक स्वरूप:
शीर्षक: बिहार में एक तरफ ‘समृद्धि यात्रा’, दूसरी ओर RJD में सियासी घमासान!
शुक्रवार को बिहार की सियासत में एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिला। जहां राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी ‘समृद्धि यात्रा’ के जरिए विकास की नई इबारत लिखने में जुटे रहे, वहीं विपक्षी खेमे में रार थमने का नाम नहीं ले रही। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने जहां अपने आवास पर आरजेडी की कोर कमेटी की बैठक बुलाकर रणनीति तलाशी, वहीं इस पार्टी और लालू परिवार से खुद को अलग कर चुकीं रोहिणी आचार्य ने एक बार फिर मोर्चा खोल दिया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर रोहिणी आचार्य ने बिना किसी का नाम लिए पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला। उन्होंने विपक्षी नेताओं की बैठक को महज एक ‘दिखावा’ करार दिया और नेताओं से आत्मचिंतन व जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित करने की अपील की।
‘कब्जा जमाए बैठे गिद्धों’ पर साधा निशाना
रोहिणी आचार्य ने अपनी पोस्ट में लिखा कि समीक्षा का दिखावा करने से ज्यादा जरूरी ‘खुद’ आत्म-मंथन करना है। उन्होंने कहा कि जब तक पार्टी के अंदर सत्ता के लिए लड़ रहे और आसपास ‘कब्जा जमाए बैठे’ कुछ ‘गिद्धों’ को ठिकाने नहीं लगाया जाएगा, तब तक किसी भी समीक्षा का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने यह भी तंज कसा कि बाकी तो पब्लिक सब जानती और समझती है।
"अपने ही काफी हैं विरासत को नष्ट करने के लिए"
इससे पहले भी रोहिणी आचार्य ने एक कड़े शब्दों वाले पोस्ट में कहा था कि किसी "महान विरासत" को नष्ट करने के लिए बाहरी लोगों की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने लिखा कि, "बड़ी शिद्दत से बनाई और खड़ी की गई ‘बड़ी विरासत’ को तहस-नहस करने के लिए परायों की जरूरत नहीं होती, अपने और अपनों के चंद षड्यंत्रकारी ‘नए बने अपने’ ही काफी होते हैं।" उन्होंने हैरानी जताई कि जिसकी वजह से पहचान और वजूद मिला, उसी पहचान को मिटाने पर अपने ही आमादा हो जाते हैं। उनके अनुसार, जब विवेक पर पर्दा पड़ जाता है और अहंकार सिर चढ़ जाता है, तब "विनाशक" ही बुद्धि और विवेक पर हावी हो जाता है।
चुनावी पराजय के बाद बढ़ी बेचैनी
यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब विधानसभा चुनाव में आरजेडी को करारी हार का सामना करना पड़ा। एनडीए ने 243 सदस्यीय विधानसभा में 200 से अधिक सीटों पर जीत हासिल कर भारी बहुमत पाया। भाजपा और जेडीयू को क्रमश: 89 और 85 सीटें मिलीं, जबकि आरजेडी 140 से अधिक सीटों के बावजूद केवल 25 सीटों तक सीमित रह गई। यह हार अब पार्टी के भीतर घमासान का कारण बनती दिख रही है।
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