यूपी एमएलसी चुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। वाराणसी और आगरा की शिक्षक सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है जबकि गोरखपुर में मुकाबला बेहद कड़ा नजर आया। इन नतीजों के बीच समाजवादी पार्टी को पिछली बार के मुकाबले फायदा मिलता दिख रहा है। खास बात यह है कि इन चुनावों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर बीजेपी के कई बड़े नेता मैदान में सक्रिय रहे थे।
विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी पांच सीटें जीत चुकी थी और एक सीट पर आगे चल रही थी। वहीं समाजवादी पार्टी दो सीटें जीत चुकी थी और तीन सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी। अगर ये रुझान अंतिम नतीजों में बदलते हैं तो बीजेपी की सीटों की संख्या पिछली बार के बराबर रह सकती है जबकि सपा की सीटें बढ़ सकती हैं।
वाराणसी और आगरा की शिक्षक सीटों पर बीजेपी को मिली हार ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है। पार्टी ने इन दोनों सीटों पर जीत हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगाई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभाएं की थीं और मंत्रियों से लेकर संगठन के नेताओं तक को प्रचार में लगाया गया था। इसके बावजूद बीजेपी यहां जीत हासिल नहीं कर पाई। दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत से पार्टी को मनोबल बढ़ाने का मौका मिला है।
गोरखपुर शिक्षक सीट पर भी मुकाबला काफी दिलचस्प रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले में बीजेपी के ध्रुव त्रिपाठी और सपा के संजय त्रिपाठी के बीच मुकाबले के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी समीकरण प्रभावित किया। शुरुआती रुझानों में बीजेपी को मामूली बढ़त मिलने की खबर थी। ऐसे में इस सीट के नतीजे पर सबकी नजर बनी रही।
लखनऊ और झांसी की स्नातक सीटों पर भी बीजेपी को चुनौती मिली। इन सीटों पर सपा की बढ़त ने पार्टी की चिंता बढ़ाई। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रुहेलखंड की कुछ सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा।
इन चुनावों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल का संकेत माना जा रहा है। हालांकि विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक चुनावों के नतीजों से विधानसभा चुनाव का सीधा अनुमान नहीं लगाया जा सकता। फिर भी बीजेपी के लिए यह अपने संगठन और मतदाताओं के बीच पकड़ की समीक्षा करने का मौका है जबकि सपा इन नतीजों को अपनी बढ़ती ताकत के रूप में देख सकती है।
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