अपनी स्वतंत्रता का मंत्र: 150 साल के सफर में ‘वंदे मातरम’ की वो कहानी जिसने फेर दी इतिहास की किताब!
India
-Oneindia Staff
Published: Thursday, January 22, 2026, 22:32 [IST]
क्या आपने कभी सोचा है कि वो कौन सी ध्वनि थी जिसने अंग्रेजों की सल्तनत की नींव हिला दी? क्या आप जानते हैं कि वो कौन सा पवित्र नारा था जिसे 150 साल पहले लिखा गया और आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति की लहर दौड़ा देता है? ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि वो ज्वलंत अलख है जिसने स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वतंत्रता की अलख जगाई। इसी 150 वर्षों के ऐतिहासिक सफर को इस बार गुजरात गणतंत्र दिवस परेड में ‘स्वतंत्रता का मंत्र: वंदे मातरम’ विषय के साथ एक विहंगम झांकी के रूप में जीवंत किया जा रहा है। यह महज झांकी नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण और उसके बदलते स्वरूप का एक दृश्य दस्तावेज है, जो स्वतंत्रता संग्राम के उन सभी महत्वपूर्ण क्षणों को ताजा करता है, जब “भारत माता की जय” का नारा बुलंद हुआ।
झांकी का अद्भुत पहला स्वर हमें सीधा 1907 के पेरिस ले जाता है, जहां गुजरात की धरती (नवसारी) से निकली वीरांगना मैडम भीकाजी कामा ने विदेशी धरती पर इतिहास रच दिया था। यह झांकी उस पल का सजीव चित्रण करती है जब उन्होंने वहां ‘वंदे मातरम’ अंकित भारतीय ध्वज फहराया था। इस ध्वज की ज्योति ने केवल पेरिस ही नहीं, बल्कि जर्मनी के स्टटगार्ट और बर्लिन में आयोजित इंडियन सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस में भी अपनी चमक बिखेरी। झांकी के मध्य में स्थापित मैडम कामा की ध्वज लहराती अर्ध-प्रतिमा आज भी गर्व से कहती है कि आजादी की लड़ाई सीमाओं के पार भी जीती गई। इसके ठीक नीचे संविधान की सभी भारतीय भाषाओं में ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ है, जो भाषा से ऊपर उठकर एकता का संदेश देता है।
अब जब नजरें झांकी के मध्य भाग में पड़ती हैं, तो एक अद्भुत समय यात्रा शुरू होती है। यहां भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा का अनोखा प्रदर्शन है। इसकी शुरुआत होती है 1906 के उस ऐतिहासिक साल से जब कोलकाता के पारसी बागान में विदेशी वस्तुओं की होली जलाते हुए पहली बार ‘वंदे मातरम’ लिखा ध्वज फहराया गया। तस्वीरें जीवंत हो उठती हैं जब 1907 के पेरिस प्रदर्शन, 1917 के होमरूल आंदोलन (जिसमें एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक शामिल थे), और 1921 में पिंगली वेंकैया द्वारा डिजाइन किए गए ध्वज को हाईलाइट किया गया है। लेकिन इस विकास यात्रा का चरमोत्कर्ष वह क्षण है जब 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने धर्मचक्र के साथ तिरंगे को उसके वर्तमान स्वरूप में अपनाया—एक क्षण जिसने गुलामी के पर्दे को हमेशा के लिए गिरा दिया।
कहानी के अंत में प्रवेश करते हैं तो हमें महात्मा गांधी का वो अहिंसक हथियार दिखाई देता है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया—चरखा। झांकी के इस भाग में गांधीजी को एक विशाल धर्मचक्र (सूतले हुए धागे के साथ) के साथ प्रदर्शित किया गया है। यह केवल एक प्रतीक नहीं है; यह स्वदेशी और स्वावलंबन का वो मूल मंत्र है जो आज के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान में भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1920 में था।
इस दृश्य यात्रा को और भी रोमांचक और प्रभावशाली बनाने के लिए, गुजराती साहित्य के ‘राष्ट्रीय शायर’ झवेरचंद मेघाणी द्वारा रचित प्रसिद्ध गीत ‘कसुंबी नो रंग’ की मनमोहक धुनें हवा में गूंजती हैं। कलाकारों की जीवंत प्रस्तुतियां और तालबद्ध गायन दर्शकों के भीतर स्वतंत्रता की वही आग जगाते हैं जो कभी क्रांतिकारियों के दिल में धधकती थी।
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष के गणतंत्र दिवस समारोह में कुल 30 झांकियां (17 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेश और 13 केंद्र सरकारी मंत्रालय) अपनी जलवा बिखेरेंगी। 77वें गणतंत्र दिवस की इस शान को चार चांद लगाने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा मौजूद रहेंगे।
गुजरात सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रस्तुत इस भव्य झांकी के पीछे डॉ. विक्रांत पांडे, किशोर बचाणी, अरविंद पटेल, डॉ. संजय कचोट और भावना वसावा जैसे अधिकारियों का सराहनीय मार्गदर्शन और योगदान रहा है, जिसने इस ऐतिहासिक कहानी को नया जीवन दिया है।
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