अक्षय तृतीया: पुण्य की अक्षय पूंजी और समृद्धि का महाद्वार
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ‘अक्षय तृतीया’ के रूप में मनाया जाता है, जो सनातन धर्म में एक अत्यंत पावन और फलदायी पर्व है। जैसा कि इसके नाम ‘अक्षय’ से ही स्पष्ट है—इस दिन किया गया दान, जप, तप और निवेश कभी नष्ट नहीं होता, बल्कि उसका फल अनंत गुना होकर वापस मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए स्नान और पूजा-पाठ से साधक को वह आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है, जो न केवल इस लोक में, बल्कि परलोक में भी उसके साथ रहती है।
स्वयं सिद्ध ‘अबूझ मुहूर्त’ का महत्व
अक्षय तृतीया की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘अबूझ मुहूर्त’ होना है। यानी, इस दिन किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत के लिए पंचांग देखने या मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं होती; पूरा दिन ही मंगलकारी होता है। शास्त्रों की मानें तो इसी दिन भगवान विष्णु ने नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव के रूप में अवतार लिया था। यही कारण है कि इस दिन लक्ष्मी-नारायण की विधिवत पूजा का विधान है। साथ ही, वस्त्र, शस्त्र और आभूषणों की खरीदारी को इस दिन अत्यंत श्रेष्ठ और समृद्धि लाने वाला माना गया है।
साधना का महामंत्र
इस पावन पर्व पर पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चारण विशेष फलदायी होता है:
‘एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः। अस्य प्रदानात्सकला मम सन्तु मनोरथाः॥’
पितृ शांति और धर्मघट दान का नियम
अक्षय तृतीया पर जल से भरे कलश (धातु या मिट्टी) के दान का विशेष महत्व है। कलश में जल, फल, पुष्प, गंध, तिल और अन्न भरकर उपरोक्त मंत्र का जाप करते हुए दान करना चाहिए। मान्यता है कि इस ‘धर्मघट’ के दान से परलोक में जा चुके पितृ तृप्त होते हैं, उन्हें प्यासा नहीं रहना पड़ता और उनके आशीर्वाद से वंश की वृद्धि होती है।
भविष्य जानने का अनूठा उपाय
इस दिन अनाज से जुड़ा एक प्राचीन प्रयोग भी प्रचलित है। अक्षय तृतीया के दिन किसी व्यक्ति विशेष के नाम से अनाज को तौल कर एक पवित्र स्थान पर रख दें। अगले दिन पुनः उसी अनाज को तौलें। यदि अनाज का वजन कम पाया जाता है, तो यह भविष्य में आने वाली चुनौतियों का संकेत माना जाता है। यदि वजन पूर्ववत रहता है, तो भविष्य सामान्य रहेगा, और यदि अनाज का भार बढ़ जाता है, तो यह आने वाले समय में अपार सुख-समृद्धि और सफलता का सूचक माना जाता है।
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