ब्रह्माजी की वह कथा जिसने बदल दी पूजा की दिशा
हिंदू धर्मग्रंथों में ऐसी अनेक रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक कथाएं छिपी हैं, जो हमें न केवल जीवन का सार सिखाती हैं, बल्कि अचंभित भी कर देती हैं। आज हम सृष्टि के रचयिता, त्रिदेवों में एक, भगवान ब्रह्मा से जुड़ी एक ऐसी ही अनूठी कथा का अनावरण करने जा रहे हैं। यूं तो ब्रह्माजी का स्थान देवों के देव महादेव और पालनहार भगवान विष्णु के समान है, परंतु उनकी पूजा-अर्चना का प्रचलन उतना व्यापक क्यों नहीं है, क्या आपने कभी इस पर विचार किया है? यदि नहीं, तो आज हम इस कथा के माध्यम से इस रहस्य से पर्दा उठाएंगे।
अबूझ पहेली: एक सौंदर्य का सृजन और मोह का आलिंगन
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब ब्रह्मांड की रचना का भार भगवान ब्रह्मा के कंधों पर था, तब उन्होंने एक अद्वितीय सौंदर्य से परिपूर्ण स्त्री का सृजन किया। इस रूपसी का नाम शतरूपा रखा गया। शतरूपा इतनी मोहक थीं कि स्वयं ब्रह्माजी भी उन पर मोहित हो गए और अपनी दृष्टियाँ उनसे हटा न सके।
त्राहिमाम शतरूपा! और शिव का ज्वलंत क्रोध
जब ब्रह्माजी एकटक शतरूपा को निहार रहे थे, तब शतरूपा अत्यंत व्याकुल हो उठीं। वह स्वयं को उस अपार निहार से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करने लगीं, परंतु उनकी हर कोशिश व्यर्थ साबित हो रही थी। यह सारा अलौकिक दृश्य भगवान शिव भी देख रहे थे। ब्रह्माजी का यह कृत्य उन्हें सहन न हुआ। शतरूपा, जो ब्रह्माजी की पुत्री के समान थीं, उन्हें इस प्रकार अपलक निहारना शिव की दृष्टि में एक घोर अपराध था। इस परब्रह्म के क्रोध की अग्नि से प्रकट हुए भगवान भैरव। महादेव के आदेश पर, भगवान भैरव ने ब्रह्माजी का पांचवां सिर धड़ से अलग कर दिया।
पश्चाताप का मार्ग और एकाकी मंदिर का रहस्य
इस घटना के पश्चात्, ब्रह्माजी को अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ और उन्होंने महादेव से क्षमा याचना की। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी प्रायश्चित के कारण, त्रिदेवों में शामिल होने के बावजूद, भगवान शिव और विष्णु की तुलना में ब्रह्माजी की पूजा-अर्चना का प्रचलन सीमित रहा। इसी एक भूल का परिणाम है कि आज भी संपूर्ण भारतवर्ष में भगवान ब्रह्मा का केवल एक ही मंदिर विद्यमान है, जो राजस्थान के पवित्र शहर पुष्कर में स्थित है।
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