शक्ति की उपासना: मां दुर्गा के पूजन की संपूर्ण और शास्त्रीय विधि
देवी दुर्गा की आराधना एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसकी शुरुआत सूर्योदय की पहली किरण से पूर्व ही हो जानी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, आराधक को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर बिस्तर पर बैठे-बैठे ही अपनी हथेलियों का दर्शन करते हुए उनके घर्षण से उत्पन्न ऊर्जा को मुख और नेत्रों पर स्पर्श करना चाहिए। इस दौरान निम्न मंत्र का उच्चारण करें:
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
भावार्थ: हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल भाग में ब्रह्मा (गोविंद) का वास है। सुबह अपनी हथेलियों में इन दिव्य शक्तियों के दर्शन कर हम धन, ज्ञान और सृजन की प्रार्थना करते हैं।
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प्राचीन पुराणों में ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्षों के चिंतन के बाद ब्रह्मांड के जो रहस्य लिखे थे, आज आधुनिक विज्ञान भी उन्हें स्वीकार कर रहा है। हमारे मनीषियों ने पंचतत्वों की महत्ता को पहचानते हुए पृथ्वी को जीवन का आधार माना। इसीलिए, धरा पर पैर रखने से पहले मां पृथ्वी से क्षमा याचना का विधान है। निम्न मंत्र से प्रार्थना करें:
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥
भावार्थ: हे समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली और पर्वतों को आभूषण बनाने वाली विष्णुप्रिया मां पृथ्वी! आप हमारे जीवन का आधार हैं। आप पर पैर रखने से पहले मैं आपसे क्षमा मांगता हूं, आप हमारा कल्याण करें।
पृथ्वी को प्रणाम करने के पश्चात स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। पूजन के लिए घर के किसी पवित्र स्थान पर चौकी सजाएं, उस पर वस्त्र बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि पुरोहित उपलब्ध हों तो वे पूजन संपन्न कराएंगे, अन्यथा आप स्वयं भी विधिपूर्वक इसे कर सकते हैं।
पूजा के समय आराधक का मुख पूर्व की ओर और पुरोहित का मुख उत्तर की ओर होना चाहिए। सर्वप्रथम मां दुर्गा का स्मरण करते हुए शुद्ध जल के छींटे अपने ऊपर और आसपास छिड़कें। इसके लिए बाएं हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की मृगमुद्रा से निम्न मंत्र का जाप करें:
ओम अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः॥
भावार्थ: हे देवी! आपके स्मरण मात्र से हम शारीरिक और मानसिक रूप से पवित्र हो रहे हैं। इसके बाद ‘ओम नमो दुर्गायै’ मंत्र का उच्चारण करते हुए प्रतिमा के सम्मुख बैठें। पूजन सामग्री जैसे जलपात्र, धूप, दीप और घंटी को बाईं ओर तथा घी का दीपक, शंख, चंदन, फूल और नैवेद्य को दाईं ओर या सामने व्यवस्थित रखें।
पूजा की शुरुआत में अपने आसन को शुद्ध करने के लिए यह मंत्र पढ़ें:
ओम पृथ्वि त्वया धृता लोका, देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
इसके पश्चात अंतःकरण की शुद्धि के लिए तीन बार आचमन करें:
ओम ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ओम ह्रीं विद्यातत्तवं शोधयामि नमः स्वाहा।
ओम क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
फिर दाहिने हाथ के अंगूठे से होंठ पोंछते हुए कहें: ओम ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
अब हाथ में अक्षत और पीली सरसों लेकर दसों दिशाओं की रक्षा के लिए ‘दिशा बंधन’ करें:
त्राहिमां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्द्धिनी। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥
दक्षिणेवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी मे रक्षेद्धस्ताद्वैष्णवी तथा॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखातुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥
दिशा बंधन के बाद दीपक प्रज्ज्वलित करें। सनातन धर्म में दीप को विवेक और बुद्धि का प्रतीक माना गया है। दीप जलाते समय कहें:
ओम भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी अविघ्नकृत। यावत्कर्म समाप्तिः स्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव॥
इसके बाद आराधक और पुरोहित एक-दूसरे को तिलक लगाएं। तिलक लगाते समय निम्न मंत्रों का प्रयोग करें:
(पुरोहित के लिए): ओम गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्…
(आराधक के लिए): शतमानं भवति शतायुर्वै पुरुषः…
रक्षा सूत्र (मौलि) बांधते समय पुरोहित यह मंत्र बोलें:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
अंत में, शास्त्रों के अनुसार किसी भी शुभ कार्य से पूर्व ‘पंचदेव’ (सूर्य, गणेश, शिव, विष्णु और दुर्गा) की पूजा अनिवार्य है:
आदित्यं गणनाथं च देवीं रुद्रं च केशवम्। पंचदैवत्यमित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत॥
– शुभा दुबे
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