दशहरा 2025: बुराई की राख से जगमगाता विजय का त्योहार, राष्ट्र की अनूठी परंपराएं

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Dussehra 2025: बुराई पर अच्छाई की जीत का महापर्व है दशहरा, हर राज्य की अनोखी परंपरा

दशहरा: बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव, हर दिल में उमंगें

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि, जब प्रकृति नवजीवन के रंग बिखेरती है और शरद का आगमन होता है, तब देश भर में दशहरा का महाउत्सव बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। माँ भगवती के विजय स्वरूप के आगमन का प्रतीक यह पर्व, विजयादशमी के नाम से भी विख्यात है। यह वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के मधुर आगमन का शुभ संदेश लेकर आता है। इस पावन अवसर पर, क्षत्रिय योद्धाओं के लिए शस्त्रों का पूजन, ब्रह्मऋषियों के लिए माँ सरस्वती का अर्चन, और व्यापारियों के लिए अपनी बही-खातों का विधिवत पूजन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को, तारा उदय के समय, ‘विजय’ नामक एक अत्यंत शुभ काल होता है, जो हर कार्य में सिद्धि प्रदान करता है।

रामलीलाओं का उल्लास, रावण दहन का रोमांच

दशहरा से ठीक दस दिन पूर्व ही, देश के कोने-कोने में रामलीलाओं का मंचन शुरू हो जाता है। प्रभु श्री राम के जीवन की कथाओं का अद्भुत चित्रण, दर्शकों को मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों से जोड़ता है। और फिर आता है वह निर्णायक क्षण, दशहरे का दिन, जब अहंकारी रावण का संहार किया जाता है। वहीं, बंगाल में, माँ दुर्गा के विसर्जन के साथ नवरात्रि के दस दिवसीय दुर्गोत्सव का समापन एक भव्य और भक्तिमय वातावरण में होता है। इस दिन, शमी वृक्ष का पूजन शुभ माना जाता है, और शाम को नीलकंठ पक्षी के दर्शन को परम सौभाग्यशाली समझा जाता है। पुराणों के अनुसार, दशहरा हमें दस प्रकार के विकारों – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी – से मुक्ति पाने की प्रेरणा देता है।

विजयी भव: राम की अयोध्या वापसी और विजयादशमी का महत्व

यह भी मान्यता है कि इसी शुभ दिन पर, भगवान श्रीराम चौदह वर्षों का वनवास काटकर और लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे। इसी ऐतिहासिक पल की स्मृति में, यह पर्व विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। पूरे भारतवर्ष में, विभिन्न स्थानों पर रावण, कुंभकरण और मेघनाद के विशाल पुतले स्थापित किए जाते हैं। सायंकाल, श्रीराम का वेष धारण किए हुए युवक अपनी वानर सेना के साथ पहुंचकर, इन पुतलों का दहन करते हैं। यह मनोरम दृश्य, सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता है। उत्तर भारत में, जहाँ भव्य मेलों के बीच रावण दहन का उत्सव मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में, रावण की पूजा भी की जाती है, जो इसकी विविधता को दर्शाता है।

उत्सवों का संगम: भारत की विविध सांस्कृतिक झलक

विजयादशमी, या दशहरा, एक ऐसा पर्व है जिसे भारत के विभिन्न प्रांतों में अनूठे ढंग से मनाया जाता है। उत्तर भारत के भव्य मेलों और रावण दहन की परंपरा से इतर, दक्षिण भारत में कुछ स्थानों पर रावण का पूजन भी होता है। कर्नाटक में, दशहरा एक राज्य उत्सव का रूप ले लेता है, और मैसूर का दशहरा तो विश्व प्रसिद्ध है। यह दस दिवसीय उत्सव, घरों, दुकानों और पूरे शहर को रंग-बिरंगी सजावटों से जीवंत कर देता है। मैसूर महल के प्रांगण में आयोजित होने वाले रंगारंग कार्यक्रम, और राजघराने द्वारा विशेष पूजा-अर्चना, इस उत्सव की गरिमा को बढ़ाते हैं। मैसूर में, सजे-धजे हाथियों के साथ निकाला जाने वाला भव्य जुलूस, देखने लायक होता है।

हिमाचल की लोक संस्कृति और बस्तर की आदिम परंपरा

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा भी अपनी एक अलग पहचान रखता है। दशहरे से एक सप्ताह पूर्व ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी-धजी स्त्रियाँ और पुरुष, तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े और बांसुरी की मधुर ध्वनि के साथ, अपने ग्रामीण देवता का भव्य जुलूस निकालते हैं। देवताओं की मूर्तियों को आकर्षक पालकियों में सुसज्जित किया जाता है। पहाड़ी लोग अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की पूजा करते हैं, और यह जुलूस नगर भ्रमण के पश्चात, रघुनाथ जी की वंदना से उत्सव का शुभारंभ करता है।

पंजाब में, दशहरे के दिन आगंतुकों का स्वागत पारंपरिक मिठाइयों और उपहारों से किया जाता है, साथ ही रावण दहन के आयोजन और मेलों का भी आनंद लिया जाता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का दशहरा, एक अनूठा पर्व है, जहाँ इसे राम की रावण पर विजय के रूप में नहीं, बल्कि माँ दंतेश्वरी की आराधना के पर्व के रूप में मनाया जाता है। दंतेश्वरी माता, बस्तर की आराध्य देवी और दुर्गा का ही एक रूप मानी जाती हैं। यहाँ दशहरे का उत्सव करीब सवा दो महीने तक चलता है। बंगाल, ओडिशा और असम में, यह पर्व विशेष रूप से दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है।

कथाओं का सार: विजय और सिद्धि का पावन क्षण

एक बार, माँ पार्वतीजी ने भगवान शिवजी से दशहरे के त्योहार के फल के बारे में पूछा। शिवजी ने उत्तर दिया कि आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल, तारा उदय के समय, ‘विजय’ नामक काल होता है, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करता है। यदि इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग हो, तो यह और भी शुभ होता है। इसी विजय काल में, भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करके रावण को परास्त किया था। इसी काल में, शमी वृक्ष ने अर्जुन के गांडीव नामक धनुष को धारण किया था।

एक अन्य कथा के अनुसार, युधिष्ठिर के प्रश्न पर, भगवान श्रीकृष्णजी ने उन्हें बताया था कि विजयादशमी के दिन, राजा को स्वयं अलंकृत होकर, अपने दासों, हाथी-घोड़ों को सजाना चाहिए। पुरोहित के साथ पूर्व दिशा में प्रस्थान कर, शत्रु की सीमा में प्रवेश कर, वास्तु पूजा और अष्ट दिगपालों तथा पार्थ देवता की वैदिक मंत्रों से पूजा करनी चाहिए। शत्रु की मूर्ति बनाकर, उसकी छाती में बाण मारना चाहिए, और पुरोहित वेद मंत्रों का उच्चारण करें। ब्राह्मणों की पूजा कर, हाथी, घोड़ा, अस्त्र, शस्त्र का निरीक्षण करना चाहिए। जो राजा इस विधि से विजय प्राप्त करता है, वह सदा अपने शत्रु पर विजयी होता है।

यह पर्व, न केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, बल्कि यह हमें अपने भीतर की बुराइयों से लड़ने और एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा भी देता है।


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