जितिया व्रत 2026: संतान की लंबी आयु के लिए क्यों जरूरी है ‘नोनी का साग’? जानें 3 अक्टूबर के शुभ मुहूर्त और खास परंपराएं
मातृशक्ति और अटूट विश्वास का महापर्व ‘जीवित्पुत्रिका व्रत’ यानी जितिया, माताओं के लिए सबसे कठिन और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। अपनी संतान की सुरक्षा, लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखे जाने वाले इस निर्जला उपवास का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अद्वितीय है। साल 2026 में यह व्रत 3 अक्टूबर को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं इस पर्व से जुड़ी उन खास परंपराओं के बारे में, जो इसे अन्य व्रतों से अलग बनाती हैं।
क्यों खास है ‘नोनी का साग’?
जितिया व्रत में ‘नहाय-खाय’ के दिन नोनी का साग खाने की परंपरा सदियों पुरानी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नोनी का साग संतान की लंबी उम्र और उनके जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने का प्रतीक माना जाता है। वैज्ञानिक और आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो नोनी का साग आयरन और कैल्शियम से भरपूर होता है, जो 36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत के लिए शरीर को जरूरी पोषण और शक्ति प्रदान करता है। यह साग विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है, ठीक वैसी ही शक्ति माताएं अपनी संतान के लिए मांगती हैं।
जितिया 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियां
पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया का मुख्य व्रत रखा जाता है।
- अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 2 अक्टूबर 2026 की देर रात से।
- मुख्य व्रत तिथि: 3 अक्टूबर 2026 (शनिवार)।
- पारण का समय: 4 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के बाद अष्टमी तिथि समाप्त होने पर व्रत का पारण किया जाएगा।
व्रत के नियम और पूजा विधि
जितिया व्रत की शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है। इस दिन व्रती महिलाएं स्नान के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं।
- निर्जला व्रत: दूसरे दिन यानी अष्टमी को महिलाएं पूरे दिन और रात बिना अन्न-जल ग्रहण किए निर्जला उपवास रखती हैं।
- जीमूतवाहन की पूजा: इस दिन भगवान जीमूतवाहन की कुशा से बनी प्रतिमा की पूजा की जाती है। साथ ही मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की आकृति बनाकर उन्हें तिलक लगाया जाता है और कथा सुनी जाती है।
- धार्मिक परंपरा: पूजा के दौरान सरसों का तेल और खल चढ़ाने का विशेष महत्व है, जिसे बाद में बच्चों के सिर पर आशीर्वाद के रूप में लगाया जाता है।
संतान के लिए ‘कवच’ है यह व्रत
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जीमूतवाहन ने अपनी उदारता से नागों की रक्षा की थी, तभी से माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए उनकी पूजा करती हैं। यह व्रत न केवल कठिन तपस्या का प्रतीक है, बल्कि यह एक मां के अपने बच्चों के प्रति निस्वार्थ प्रेम और समर्पण को भी दर्शाता है।
3 अक्टूबर 2026 को पड़ने वाला यह जितिया व्रत माताओं के लिए श्रद्धा और विश्वास का नया अध्याय लेकर आएगा। पारंपरिक नियमों का पालन और विधि-विधान से की गई पूजा निश्चित रूप से संतान के जीवन में खुशहाली और आरोग्य लेकर आती है।
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