चार धाम यात्रा 2025: बद्रीनाथ के कपाट बंद होने की तारीखें तय, श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण सूचना
उत्तराखंड की पावन भूमि पर स्थित चार धाम – केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री – आस्था और भक्ति का अनूठा संगम हैं, जो हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ये पवित्र स्थल केवल कुछ महीनों के लिए ही भक्तों के लिए खुले रहते हैं। अब, 2025 की चार धाम यात्रा के समापन की ओर बढ़ते हुए, बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने की तिथियों का भी निर्धारण कर दिया गया है।
बद्रीनाथ मंदिर के कपाट कब होंगे बंद?
चमोली जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बद्रीनाथ मंदिर, विजयादशमी के शुभ अवसर के पश्चात शीतकालीन विश्राम के लिए अपने कपाट बंद कर देगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, गढ़वाल हिमालय की गोद में बसे इस दिव्य धाम के कपाट 25 नवंबर 2025 को दोपहर 2:56 बजे बंद किए जाएंगे। इसके बाद, मंदिर 2026 में पुनः दर्शनार्थियों के लिए खोला जाएगा।
पंच पूजाओं की परंपरा और गणेश जी की विशेष पूजा
कपाट बंद करने की प्रक्रिया एक विस्तृत अनुष्ठान का हिस्सा है, जिसे पंच पूजाओं के नाम से जाना जाता है। इस श्रृंखला में, 21 नवंबर को सर्वप्रथम भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी और तत्पश्चात उनके कपाट भी बंद कर दिए जाएंगे।
आदि केदारेश्वर और शंकराचार्य मंदिर के कपाट भी होंगे बंद
पंच पूजाओं के अगले क्रम में, 22 नवंबर को आदि केदारेश्वर मंदिर और आदि गुरु शंकराचार्य जी के मंदिर के कपाट बंद किए जाएंगे। इस दिन, शीतकालीन विश्राम की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जाएगा।
खडग-पुस्तक पूजन और वेद ऋचाओं का समापन
23 नवंबर का दिन खडग-पुस्तक पूजन और वेद ऋचाओं के नियमित वाचन के समापन को समर्पित होगा। इसी दिन से शीतकालीन तैयारी से जुड़ी अंतिम पूजा-अर्चना की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
मां लक्ष्मी जी को कढ़ाई भोग
24 नवंबर को मां लक्ष्मी जी को विशेष कढ़ाई भोग अर्पित किया जाएगा, जो देवी की कृपा का प्रतीक है। यह एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है जो अगले दिन मंदिर के मुख्य कपाट बंद होने का संकेत देता है।
शीतकालीन प्रवास के लिए देवी-देवताओं का प्रस्थान
कपाट बंद होने के अगले दिन, 26 नवंबर को, श्री कुबेर जी, श्री उद्धव जी और रावल जी के साथ-साथ आदि गुरु शंकराचार्य जी की गद्दी पांडुकेश्वर और श्री नृसिंह मंदिर, जोशीमठ के लिए शीतकालीन प्रवास हेतु प्रस्थान करेगी। यह देवत्व के निचले क्षेत्रों में वास करने का प्रतीकात्मक प्रस्थान है, जहाँ उनकी पूजा-अर्चना शीतकाल में भी जारी रहती है।
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