अंगारों पर आस्था का ज्वार: देवरी के श्री देव खंडेराव मंदिर का अनूठा अग्नि मेला
भारत, अपनी अनगिनत सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और रहस्यों का देश है। ऐसी ही एक अविश्वसनीय परंपरा मध्य प्रदेश के सागर जिले के देवरी नगर में देखने को मिलती है, जहां हर साल अगहन महीने की शुक्ल पक्ष की चंपा षष्ठी से पूर्णिमा तक एक अद्भुत अग्नि मेले का आयोजन होता है। देवरी नगर से 65 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन श्री देव खंडेराव मंदिर इस मेले का केंद्र है, जहाँ भक्त अपनी मनोकामनाएं पूरी होने पर दहकते हुए अंगारों से भरे अग्निकुंड पर नंगे पैर चलकर अपनी अटूट आस्था और भक्ति का प्रदर्शन करते हैं। यह नज़ारा विस्मयकारी होता है, जहाँ सैकड़ों लोग एक साथ अंगारों पर चलकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। इस वर्ष भी, एक साथ 300 श्रद्धालुओं ने इस अग्नि कुंड से गुजरकर सभी को चकित कर दिया, और इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए हजारों की संख्या में भक्तजन उमड़ पड़े।
400 साल पुरानी परंपरा का जन्म: राजा की मन्नत और ईश्वरीय कृपा
इस 400 साल पुरानी परंपरा के पीछे एक मार्मिक कहानी छिपी है। किंवदंतियों के अनुसार, बहुत समय पहले देवरी के राजा यशवंत राव का पुत्र एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त था। तमाम उपचारों के बावजूद, बच्चे की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। एक रात, राजा को स्वप्न में श्री देव खंडेराव जी के दर्शन हुए। भगवान ने राजा को निर्देश दिया कि यदि वे मंदिर में हल्दी का हाथी चढ़ाएं, अपने पुत्र के स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना करें, और अग्नि कुंड से नंगे पैर होकर गुजरें, तो उनकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।
अग्नि पर चलने की रीति: आस्था की परीक्षा और पूर्णता का प्रतीक
राजा यशवंत राव ने स्वप्न में मिले आदेश का पूरी श्रद्धा से पालन किया। उन्होंने मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना की और अग्निकुंड से नंगे पैर गुजरे। मान्यता है कि इस अलौकिक कार्य के तुरंत पश्चात, राजा का पुत्र पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। जो भी भक्त श्री देव खंडेराव जी से सच्चे मन से कोई मन्नत मांगता है और उसकी इच्छा पूरी हो जाती है, वह अपनी कृतज्ञता और आस्था को व्यक्त करने के लिए इस अग्नि मेले में धधकती अग्नि के अंगारों पर चलता है। भक्तजन पीले वस्त्र धारण करके, हाथों में हल्दी लेकर, जयकारे लगाते हुए अग्निकुंड में नौ कदम चलते हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान खंडेराव की कृपा से उन्हें अंगारों की तपन महसूस नहीं होती।
अग्नि मेले का समय: दिसंबर में आस्था का महाउत्सव
यह अनूठा अग्नि मेला विशेष रूप से दिसंबर के महीने में आयोजित होता है। इसकी शुरुआत अगहन मास की चंपा षष्ठी के दिन से होती है और यह पूर्णिमा तक चलता है। इस मेले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ठीक दोपहर 12 बजे, जब मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग पर सूर्य की पहली किरण पड़ती है, तब अग्निकुंड से निकलने की रस्म शुरू होती है। भक्तजन विधि-विधान से अग्निकुंड की पूजा करते हैं, उस पर हल्दी छिड़कते हैं, और फिर अपनी मन्नतों की पूर्णता के प्रतीक के रूप में नंगे पैर दहकते अंगारों के ऊपर चलकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
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