दुर्गा पूजा का हृदय: संधि पूजा – वह क्षण जब देवी ने महिषासुर का संहार किया
कोलकाता: बंगाल, बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत के अन्य राज्यों में दुर्गा पूजा का उत्सव अपने चरम पर होता है, और इस दौरान एक विशेष अनुष्ठान, ‘संधि पूजा’, का महत्व अनमोल है। यह वह पवित्र घड़ी है जब अष्टमी तिथि का अंत होता है और नवमी तिथि का आरंभ, एक ऐसा संधिकाल जो देवी दुर्गा के शौर्य और शक्ति का प्रतीक है।
क्या है संधि पूजा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी संधि बेला में देवी दुर्गा ने महापराक्रमी राक्षस महिषासुर का वध कर धर्म की स्थापना की थी। यह 48 मिनट का अनमोल समय, अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के प्रारंभिक 24 मिनट, को अत्यंत शुभ और शक्तिशाली माना जाता है।
शिवालय ट्रस्ट, कोलकाता के श्री ब्रह्मानंद (अभिजीत शास्त्री) बताते हैं कि इस संधि बेला का क्षण तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब अष्टमी का अंत और नवमी का पहला दंड शुरू होता है। इसी वक्त बलिदान का विधान है। पूजन अष्टमी तिथि से प्रारंभ होता है, लेकिन बलिदान नवमी के प्रथम दंड में होता है। इसी बलिदान की वजह से इस पूजा को ‘महापूजा’ की संज्ञा दी गई है। देवी के स्नान, पूजन, बलिदान और हवन – इन सबको मिलाकर दुर्गा पूजा एक महापूजा बनती है। इस अवसर पर दो प्रकार की पूजा का विधान है: एक मां के चामुंडा स्वरूप की और दूसरी स्वयं मां दुर्गा की।
महिषासुर वध से संबंध
दुर्गा सप्तशती के अनुसार, देवी दुर्गा ने इसी संधि काल में राक्षस चंड और मुण्ड का वध कर चामुंडा का रूप धारण किया था। कुछ परंपराएं इसे महिषासुर के वध के अंतिम क्षणों से जोड़ती हैं, तो कुछ चंड-मुण्ड के वध का काल मानती हैं। इसी कारण संधि पूजा को दुर्गा पूजा का सबसे ऊर्जावान और शक्तिशाली अनुष्ठान माना जाता है।
108 दीपक और कमल फूल का महत्व
इस महापूजा के दौरान 108 दीपक जलाने और 108 कमल पुष्प मां को अर्पित करने का विधान है। श्री ब्रह्मानंद (अभिजीत शास्त्री) के अनुसार, इसका संबंध भगवान राम द्वारा रावण वध से पूर्व देवी दुर्गा की पूजा से है। संकल्प के अनुसार, प्रभु राम ने 108 कमल फूल अर्पित करने थे, परंतु देवी ने एक पुष्प माया से गायब कर दिया। तब भगवान राम ने, जिन्हें ‘राजीवलोचन’ (कमल नेत्र वाले) कहा जाता है, अपने नेत्र अर्पित करने का विचार किया। यह देख देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया।
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यह संधि पूजा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि देवी दुर्गा की असीम शक्ति, बलिदान और विजय का प्रतीक है, जो हर साल भक्तों को नई ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करती है।
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