सूर्य का रथ, नंदा का आशीष: मार्गशीर्ष सूर्य सप्तमी का पावन पर्व
आज का दिन विशेष है, क्योंकि आज हम मार्गशीर्ष सूर्य सप्तमी का व्रत मना रहे हैं। यह पावन तिथि रथ सप्तमी या सूर्य जयंती के नाम से भी जानी जाती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की यह सप्तमी तिथि सूर्य देव को समर्पित है, जो उन्हें उनके जन्मदिन के रूप में पूजने का अवसर प्रदान करती है। इस पावन अवसर पर, सूर्य देव की उपासना कर हम उत्तम स्वास्थ्य, निरोगी काया और समृद्धि की कामना करते हैं। आइए, सूर्य सप्तमी व्रत के महत्व और इसकी पूजा विधि को विस्तार से जानें।
सूर्य सप्तमी: विविध नामों से पूजित, एक महत्वपूर्ण पर्व
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अर्क सप्तमी, अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, आरोग्य सप्तमी और भानु सप्तमी जैसे कई नामों से जाना जाता है। इस दिन सूर्य देव की आराधना करने वाले भक्त सदा निरोगी रहते हैं। यह पर्व, विशेष रूप से उत्तर भारत में, बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसे नंदिनी व्रत या नंदा सप्तमी व्रत के नाम से भी पुकारा जाता है। नंदा सप्तमी, हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो देवी नंदा – मां पार्वती का एक स्वरूप – और सूर्य देव को समर्पित है। इस दिव्य पर्व का महत्व कई पहलुओं से जुड़ा है, और यह व्रत विशेष रूप से सप्तमी तिथि को ही पड़ता है। नंदा सप्तमी का व्रत मुख्य रूप से तीन प्रमुख शक्तियों की आराधना के लिए विख्यात है: देवी नंदा, भगवान श्री गणेश और सूर्य देव। इस वर्ष, मार्गशीर्ष सूर्य सप्तमी का पावन पर्व 27 नवंबर को मनाया जा रहा है।
पवित्र स्नान और सूर्य को अर्घ्य: आरोग्य का मार्ग
माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन, सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करना और सूर्य देव को दीपदान करना अत्यंत फलदायी माना गया है। यदि किसी अन्य के जलाशय में स्नान करना पड़े, तो सूर्योदय से पहले उसमें स्नान करना बड़ा ही पुण्यकारी होता है। मित्र सप्तमी के दिन पवित्र नदी में स्नान करते हुए सूर्य देव को जल चढ़ाने का विशेष महत्व है। ब्रह्मांड में सकारात्मकता के प्रतीक, सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता के रूप में पूजा जाता है। मित्र सप्तमी के दिन सूर्य देव की पूजा करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है, आंखों की रोशनी बढ़ती है और त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है।
देवी नंदा: मां पार्वती का पावन स्वरूप
नंदा देवी को माता पार्वती या देवी दुर्गा का ही एक स्वरूप माना जाता है। वह नवदुर्गाओं में से एक हैं और प्राचीन काल से ही हिमालय क्षेत्र/उत्तराखंड की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। नंदा सप्तमी का व्रत मार्गशीर्ष या अगहन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है।
मार्गशीर्ष सूर्य सप्तमी का विशेष फल
पंडितों के अनुसार, इस दिन देवी नंदा की पूजा करने से भक्तों को सर्व-सुख, सौभाग्य, बल और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह व्रत जीवन में शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। चूंकि यह सप्तमी तिथि को पड़ता है, इसलिए इसे ‘भानु सप्तमी’ या ‘सूर्य सप्तमी’ भी कहा जाता है।
इसी कारण, इस दिन सूर्य देव की आराधना का विशेष महत्व है। सूर्य देव तेज, आरोग्य और ऊर्जा के प्रतीक हैं। सूर्य की उपासना से व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है और लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है। इस दिन सूर्य देव को अर्घ्य देना और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना विशेष लाभप्रद होता है।
प्रथम पूज्य गणेश जी का पूजन: बाधाओं से मुक्ति
मार्गशीर्ष सूर्य सप्तमी व्रत के दिन, भगवान श्री गणेश की विधि-विधान से पूजा करना भी आवश्यक है। किसी भी शुभ कार्य या देवी-देवता के पूजन से पहले गणेश जी का पूजन अनिवार्य माना जाता है। गणेश जी की पूजा से व्रत में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं और पूजा सफल होती है।
सूर्य सप्तमी व्रत के अद्भुत लाभ
पंडितों के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति से करने वाले भक्तों को सूर्य देव की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त होती है। यह व्रत सभी प्रकार के दोषों को दूर करने वाला और मन को शांति प्रदान करने वाला माना जाता है। देवी नंदा के आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
मार्गशीर्ष सूर्य सप्तमी पर ऐसे करें पूजा
पंडितों के अनुसार, सप्तमी के दिन पवित्र नदियों में स्नान करें और सूर्य देव को जल चढ़ाएं। इस दिन व्रत रखें और केवल फल का सेवन करें, नमक बिल्कुल न खाएं। लाल चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला से गायत्री मंत्र का जाप करने से मानसिक खुशी, शांति और शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है। उगते सूर्य को अर्घ्य देना और गिरती जल धारा के बीच सूर्य देव के दर्शन करने से आंखों की बीमारियों में सुधार होता है। मित्र सप्तमी के दिन सात घोड़ों पर सवार सूर्य देव की तस्वीर या मूर्ति की पूजा करने से त्वचा संबंधी रोगों में राहत मिलती है।
सूर्य सप्तमी व्रत से जुड़ी मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है और निरोगी काया का वरदान प्राप्त होता है। इस दिन किए गए स्नान, दान और पूजा-पाठ का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। यह दिन सूर्य देव का जन्मदिन माना जाता है, जब उन्होंने पहली बार अपने रथ पर सवार होकर इस दुनिया को प्रकाशित किया था। इसी दिन से सूर्य का रथ उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू होता है, जो लंबे और गर्म दिनों की शुरुआत का प्रतीक है।
मार्गशीर्ष सूर्य सप्तमी से जुड़ी पौराणिक कथा
रथ सप्तमी का दिन केवल भगवान सूर्य के जयंती का दिन नहीं है, बल्कि यह वह दिन भी है जब श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को उनके श्राप के कारण सूर्य सप्तमी व्रत की शुरुआत हुई थी। यह दिन श्री कृष्ण के पुत्र सांब से भी संबंधित है। हिन्दू धर्म में रथ सप्तमी को अचला सप्तमी, सूर्य सप्तमी, सूर्य जयंती और माघ सप्तमी आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन स्नान करना और दान देना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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