मातृ नवमी 2026: पूर्वज माताओं के आशीर्वाद और कृतज्ञता का पावन पर्व
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का सबसे पवित्र अवसर माना जाता है। इसी कड़ी में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि विशेष रूप से ‘मातृ नवमी’ के रूप में पूजनीय है। यह दिन परिवार की उन दिवंगत महिलाओं को समर्पित है, जिन्होंने अपने स्नेह और संस्कारों से कुल को सींचा। मातृ नवमी पर मातृशक्ति का श्राद्ध कर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है।
बहुओं के लिए सौभाग्य का दिन
जिस प्रकार पुत्र अपने पिताओं के लिए तर्पण करते हैं, उसी प्रकार मातृ नवमी पर घर की बहुएं अपनी दिवंगत सास, दादी और अन्य महिला पूर्वजों का विधि-विधान से श्राद्ध करती हैं। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान-पुण्य सीधे उन तक पहुँचता है और परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
किनके लिए किया जाता है श्राद्ध?
यह तिथि उन विवाहित महिलाओं के श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ है, जिनका निधन नवमी तिथि को हुआ हो। इसके साथ ही, यदि परिवार की किसी महिला पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो उनका श्राद्ध भी इसी दिन करना शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं वर्ष 2026 में मातृ नवमी की तिथि और पूजन विधि।
मातृ नवमी 2026: शुभ मुहूर्त और समय
- नवमी तिथि आरंभ: 04 अक्टूबर 2026, रविवार, प्रातः 05:51 बजे से।
- नवमी तिथि समाप्त: 05 अक्टूबर 2026, सोमवार, प्रातः 03:53 बजे तक।
- उदया तिथि: उदया तिथि के अनुसार मातृ नवमी 04 अक्टूबर को ही मनाई जाएगी।
- कुतुप मुहूर्त: प्रातः 11:46 से दोपहर 12:33 तक (श्राद्ध के लिए 47 मिनट की विशेष अवधि)।
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 से दोपहर 01:20 तक।
श्राद्ध की संपूर्ण विधि: कैसे करें प्रसन्न?
- संकल्प और आह्वान: सुबह जल्दी स्नान के बाद दिवंगत महिलाओं का स्मरण करें और उनके निमित्त श्राद्ध कर्म का संकल्प लें।
- तर्पण: घर की बहू या अन्य स्त्री काले तिल और सफेद फूलों के साथ पितरों का तर्पण करें।
- पिंडदान: चावल या जौ के आटे में घी, दूध और चीनी मिलाकर पिंड तैयार करें और श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। जल तर्पण के साथ उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करें।
- पंचबलि भोग: इस दिन माता की पसंद का सात्विक भोजन बनाएं और ‘पंचबलि’ (गाय, कुत्ता, कौआ, देव और चींटी) के लिए अंश निकालें।
- ब्राह्मणी भोज: श्राद्ध के पश्चात किसी योग्य ब्राह्मणी को आदरपूर्वक भोजन कराएं।
- दान-दक्षिणा: यदि दिवंगत महिला सुहागिन थीं, तो उनके सम्मान में सुहाग की सामग्री (बिंदी, चूड़ी आदि) दान करना अत्यंत फलदायी होता है।
- हवन और विदाई: अंत में गोबर के उपले पर हवन कर पूर्वजों को विदाई दें और घर की खुशहाली की कामना करें।
मातृ नवमी का आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों में मातृ नवमी को ‘सौभाग्यवती श्राद्ध’ भी कहा गया है। यह तिथि महिलाओं की मुक्ति और सद्गति के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। चाहे महिला का निधन किसी भी पक्ष या तिथि को हुआ हो, इस विशेष दिन उनका श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को परम शांति प्राप्त होती है और वे प्रसन्न होकर परिवार को धन-धान्य और वंश वृद्धि का वरदान देती हैं।
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