रामचन्द्राय नमः
ज्ञानगंगा: रामचरितमानस – भाग 42: प्रभु के जन्म के अलौकिक कारण
एक दिव्य श्लोक
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं,
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये,
ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः।
अर्थ: यह श्री रामचरितमानस अत्यंत निर्मल, पवित्र, कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति देने वाला, माया-मोह रूपी मैल को दूर करने वाला तथा प्रेम के जल से परिपूर्ण है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसमें गोता लगाते हैं, वे संसार रूपी सूर्य की भयानक किरणों से जलते नहीं हैं।
दोहा
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥
भावार्थ: (श्री रामचन्द्रजी) असुरों का संहार कर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यही मुख्य कारण है।
चौपाई
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥
राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥1॥
भावार्थ: उसी यश का गान करते हुए भक्त भवसागर से तर जाते हैं। कृपा के सागर भगवान भक्तों के कल्याण के लिए ही शरीर धारण करते हैं। श्री रामचन्द्रजी के जन्म लेने के अनेक कारण हैं, जो एक से बढ़कर एक विचित्र हैं।
पहला जन्म: जय और विजय का शाप
जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ॥2॥
भावार्थ: हे सुंदर बुद्धि वाली भवानी! मैं उनके दो-एक जन्मों का विस्तार से वर्णन करता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। श्री हरि के प्रिय द्वारपाल जय और विजय हैं, जिन्हें सब कोई जानते हैं।
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥
कनककसिपु अरु हाटकलोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन॥3॥
भावार्थ: उन दोनों भाइयों ने ब्राह्मण (सनकादि ऋषियों) के शाप से तामसी असुरों का शरीर पाया। एक का नाम था हिरण्यकशिपु और दूसरे का हिरण्याक्ष। ये देवराज इन्द्र के गर्व को चूर्ण करने वाले, सारे जगत में प्रसिद्ध हुए।
बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा॥4॥
भावार्थ: वे युद्ध में विजय पाने वाले विख्यात वीर थे। इनमें से एक हिरण्याक्ष को भगवान ने वराह (सूअर) का शरीर धारण करके मारा, फिर दूसरे हिरण्यकशिपु का नरसिंह रूप धारण करके वध किया और अपने भक्त प्रह्लाद का यश सारे जगत में फैलाया।
दूसरा जन्म: रावण और कुम्भकर्ण
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।
कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान॥
भावार्थ: वे ही दोनों (जय और विजय) जाकर बड़े बलवान और महावीर राक्षस हुए, जिन्हें सारा जगत जानता है – रावण और कुम्भकर्ण।
तीसरा जन्म: दशरथ-कौसल्या के पुत्र
मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥
एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥1॥
भावार्थ: भगवान के द्वारा मारे जाने पर भी वे (हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष) मुक्त नहीं हुए, क्योंकि ब्राह्मण के वचन (शाप) का प्रमाण तीन जन्मों तक था। अतः एक बार उनके कल्याण के लिए भक्तप्रेमी भगवान ने फिर अवतार लिया।
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा॥2॥
भावार्थ: उस अवतार में कश्यप और अदिति उनके माता-पिता हुए, जो (त्रेतायुग में) दशरथ और कौसल्या के नाम से प्रसिद्ध थे। एक कल्प में इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसार में पवित्र लीलाएँ कीं।
चौथा जन्म: जलंधर और रावण
एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥
संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा॥3॥
भावार्थ: एक कल्प में सब देवताओं को जलन्धर दैत्य से युद्ध में हार जाने के कारण दुःखी देखकर शिवजी ने उसके साथ बड़ा घोर युद्ध किया, पर वह महाबली दैत्य मारे बिना मरता न था।
परम सती असुराधिप नारी। तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी॥4॥
भावार्थ: उस दैत्यराज की स्त्री परम सती (बड़ी पतिव्रता) थी। उसी के प्रताप से त्रिपुरासुर का विनाश करने वाले शिवजी भी उस दैत्य को नहीं जीत सके।
दोहा
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।
जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह॥
भावार्थ: प्रभु ने छल से उस स्त्री का व्रत भंग करके देवताओं का काम किया। जब उस स्त्री ने यह भेद जाना, तब उसने क्रोध करके भगवान को शाप दिया।
चौपाई
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥
तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥1॥
भावार्थ: लीलाओं के भंडार कृपालु हरि ने उस स्त्री के शाप को प्रामाण्य दिया (स्वीकार किया)। वही जलन्धर उस कल्प में रावण हुआ, जिसे श्री रामचन्द्रजी ने युद्ध में मारकर परमपद (मोक्ष) दिया।
एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नरदेहा॥
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी॥2॥
भावार्थ: एक जन्म का कारण यह था, जिससे श्री रामचन्द्रजी ने मनुष्य देह धारण किया। हे भरद्वाज मुनि! सुनो, प्रभु के प्रत्येक अवतार की कथा का कवियों ने नाना प्रकार से वर्णन किया है।
पाँचवाँ जन्म: नारदजी का शाप
नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥
गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानी॥3॥
भावार्थ: एक बार नारदजी ने शाप दिया, अतः एक कल्प में उसके लिए अवतार हुआ। यह बात सुनकर पार्वतीजी बड़ी चकित हुईं (और बोलीं कि) नारदजी तो विष्णु भक्त और ज्ञानी हैं।
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा॥
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी॥4॥
भावार्थ: मुनि ने भगवान को शाप किस कारण से दिया? लक्ष्मीपति भगवान ने उनका क्या अपराध किया था? हे पुरारि (शंकरजी)! यह कथा मुझसे कहिए। मुनि नारद के मन में मोह होना बड़े आश्चर्य की बात है।
दोहा
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥
भावार्थ: तब महादेवजी ने हँसकर कहा – न कोई ज्ञानी है, न मूर्ख। श्री रघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है।
सोरठा
कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।
भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद॥
भावार्थ: (याज्ञवल्क्यजी कहते हैं) – हे भरद्वाज! मैं श्री रामचन्द्रजी के गुणों की कथा कहता हूँ, तुम आदर से सुनो। तुलसीदासजी कहते हैं- मान और मद को छोड़कर आवागमन का नाश करने वाले रघुनाथजी को भजो।
नारदजी का तप और इंद्र का भय
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥1॥
भावार्थ: हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुंदर गंगाजी बहती थीं। वह परम पवित्र सुंदर आश्रम देखने पर नारदजी के मन को बहुत ही सुहावना लगा।
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥2॥
भावार्थ: पर्वत, नदी और वन के सुंदर विभागों को देखकर नारदजी का लक्ष्मीकांत भगवान के चरणों में प्रेम हो गया। भगवान का स्मरण करते ही उन नारद मुनि के शाप की (जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापति ने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते थे) गति रुक गई और मन के स्वाभाविक ही निर्मल होने से उनकी समाधि लग गई।
मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥3॥
भावार्थ: नारद मुनि की यह तपोमयी स्थिति देखकर देवराज इंद्र डर गया। उसने कामदेव को बुलाकर उसका आदर-सत्कार किया और कहा कि मेरे हित के लिए तुम अपने सहायकों सहित नारद की समाधि भंग करने को जाओ। यह सुनकर मीनध्वज (कामदेव) मन में प्रसन्न होकर चला।
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥4॥
भावार्थ: इन्द्र के मन में यह डर हुआ कि देवर्षि नारद मेरी पुरी अमरावती का राज्य चाहते हैं। जगत में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं।
शेष अगले प्रसंग में ————-
राम नाम का महात्म्य
राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥
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