मायाजाल में फँसे वैकुण्ठवासी: नारद के अहंकार और विष्णु के संकल्प की कहानी।

By
Aware Media Network
Aware Media Network एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरें, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी...
- News Desk
3 Min Read
narada arrogance vishnu vow sages emerge from vaikuntha trapped in the web of illusion

नारद मुनि का अहंकार और श्रीहरि की माया: एक अविस्मरणीय प्रसंग
गरुड़ भी ठहर गए! नारद मुनि अहंकार के ऐसे अश्व पर सवार थे, जिसकी गति ने स्वयं गरुड़ को भी अचंभित कर दिया। यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी, बल्कि अपनी शक्ति और प्रभुत्व का प्रदर्शन था, जिसे वे बैकुंठ तक ले आए थे।

श्रीहरि का प्रण: नारद मुनि के इस दर्प को देखकर भगवान विष्णु ने निश्चय कर लिया था कि वे इस अहंकार के रोग का समूल नाश करेंगे। लेकिन नारद मुनि को इस बात का आभास तक नहीं था कि उनके सपनों की दुनिया को ढहाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

बैकुंठ का संतोष: नारद मुनि का बैकुंठ आगमन सफल रहा। उन्हें लगा कि श्रीहरि ने उनकी महत्ता को स्वीकार कर लिया है, क्योंकि उन्हें वह उपदेश नहीं मिला था जो शंकर जी ने दिया था। अपनी ही विजय के मद में चूर, उन्होंने विष्णु को प्रणाम किया और विदा हो गए।

मायावी नगर का निर्माण: बैकुंठ से निकलते ही, श्रीहरि ने उसी मार्ग पर एक ऐसी मायावी नगरी का निर्माण करवाया, जिसकी आभा बैकुंठ से भी अधिक मनमोहक थी। वहां के नागरिक कामदेव और रति के स्वरूप में विचरण कर रहे थे।

शीलनिधि का वैभव और विश्वमोहिनी का सौंदर्य: इस नगरी का राजा शीलनिधि था, जिसका वैभव सौ इंद्रों के समान था। उसकी पुत्री, विश्वमोहिनी, इतनी रूपवान थी कि स्वयं लक्ष्मी जी भी मोहित हो जातीं।

स्वयंवर का आयोजन: नगर में विभिन्न देशों के राजा पधारे थे, जिनका एकमात्र उद्देश्य विश्वमोहिनी का वरण करना था।

नारद का आश्चर्य और अभिमान: इस अद्भुत नगर को देखकर नारद मुनि चकित रह गए। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि वे इतनी बार बैकुंठ आए, पर पहले कभी इस नगरी पर उनकी दृष्टि क्यों नहीं पड़ी। नगर में प्रवेश कर, उन्होंने राजा शीलनिधि से भेंट की। इस दौरान उनके मन में यह अभिमान जागृत हुआ कि समस्त संसार उनके चरणों में है, क्योंकि उन्होंने कामदेव को परास्त किया था।

विश्वमोहिनी पर दृष्टि: जब राजा शीलनिधि ने अपनी पुत्री विश्वमोहिनी को बुलाया, तो नारद मुनि उसे देखकर स्तंभित रह गए। उन्होंने समस्त लोकों का भ्रमण किया था, पर ऐसा अनुपम सौंदर्य कभी नहीं देखा।

नियति का खेल: विश्वमोहिनी के लक्षण और हस्तरेखाओं को देखकर नारद मुनि स्वयं को भूल बैठे। उनके मन में एक गहरा संतोष था, पर उन्होंने इसे प्रकट नहीं किया। जिस कामविजय का उन्हें गर्व था, वही कामदेव उनके हृदय में पुनः जागृत हो गया था।

रहस्यमय चमक: विश्वमोहिनी की हस्तरेखाओं में कुछ ऐसा था जिसने नारद मुनि की आँखों में एक विशेष चमक ला दी थी। क्या लिखा था उसके भाग्य में, जिसने मुनि को भीतर ही भीतर प्रफुल्लित कर दिया था?

यह रहस्य अगले अंक में खुलेगा…


Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Share This Article
Follow:
Aware Media Network एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरें, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी संपादकीय टीम विश्वसनीय स्रोतों, आधिकारिक आंकड़ों और पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांतों के आधार पर समाचार तैयार करती है। Aware Media Network का उद्देश्य निष्पक्ष, सटीक और समय पर जानकारी प्रदान करना है, ताकि पाठक जागरूक निर्णय ले सकें और समसामयिक घटनाओं को बेहतर ढंग से समझ सकें।
कोई टिप्पणी नहीं

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Exit mobile version