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ग्लास्गो की ट्रैक पर भारत का ऐतिहासिक ‘डबल धमाका’: दिलीप को स्वर्ण और बासिल को रजत, पैरा एथलेटिक्स में रचा नया कीर्तिमान
ग्लास्गो, 30 जुलाई: स्कॉटलैंड की धरती पर भारतीय तिरंगा आज शान से लहराया। राष्ट्रमंडल खेलों की पैरा एथलेटिक्स स्पर्धा में भारत ने तब इतिहास रच दिया, जब पुरुषों की 100 मीटर टी47 स्पर्धा के पोडियम पर शीर्ष दो स्थानों पर भारतीय एथलीटों ने कब्जा जमाया। युवा सनसनी दिलीप महादू गावित ने 10.71 सेकेंड के रिकॉर्ड समय के साथ न केवल स्वर्ण पदक जीता, बल्कि खेलों का एक नया रिकॉर्ड और सत्र का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी दर्ज किया। उनके ठीक पीछे केरल के मोहम्मद बासिल मोर्सिंगनकाथ रहे, जिन्होंने 10.83 सेकेंड में दौड़ पूरी कर रजत पदक अपने नाम किया।
इस स्पर्धा का कांस्य पदक इंग्लैंड के केविन सैंटोस (10.85 सेकेंड) के खाते में गया। ग्लास्गो खेलों में भारत का यह तीसरा स्वर्ण पदक है। इससे पहले दिग्गज भारोत्तोलक मीराबाई चानू (48 किग्रा) और पैरा गोला फेंक खिलाड़ी शर्मिला धनखड़ (एफ57 स्पर्धा) ने भारत की झोली में सोना डाला था।
क्या है टी47 और एफ-वर्गीकरण की चुनौती?
पुरुषों की 100 मीटर टी47 एक ऐसी फर्राटा दौड़ है जिसमें शरीर के एक हिस्से की ताकत या समन्वय से प्रभावित खिलाड़ी (विशेषकर एक हाथ की अक्षमता वाले) हिस्सा लेते हैं। इन पदकों की बदौलत भारत अब पदक तालिका में 3 स्वर्ण, 9 रजत और 3 कांस्य के साथ आठवें स्थान पर मजबूती से टिका है। हालांकि, चक्का फेंक (डिस्कस थ्रो) में भारत पदक से चूक गया, जहाँ सागर थायत और देवेंद्र कुमार क्रमश: छठे और सातवें स्थान पर रहे। एफ43 वर्ग में सागर ने 51.79 मीटर के साथ एशियाई रिकॉर्ड बनाया, जबकि एफ44 वर्ग में देवेंद्र ने 48.20 मीटर का थ्रो किया।
हादसे को मात देकर फहराया जीत का परचम
स्वर्ण विजेता दिलीप गावित की कहानी अदम्य साहस की मिसाल है। महाराष्ट्र के नासिक स्थित तोरण डोंगरी गांव में जन्मे दिलीप ने महज छह साल की उम्र में एक पेड़ से गिरने के कारण अपना दाहिना हाथ खो दिया था। इलाज में देरी से हुए गैंग्रीन ने उनके और उनके किसान परिवार की दुनिया उजाड़ दी थी, लेकिन दिलीप ने हार नहीं मानी। वहीं, रजत पदक विजेता 21 वर्षीय बासिल जन्म से ही शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जिन्हें उनके परिवार का अटूट समर्थन प्राप्त है।
बारिश से भीगा ट्रैक और बुलंद इरादे
जीत के बाद दिलीप ने बताया कि फाइनल के दौरान ट्रैक बारिश से भीगा हुआ था, जिससे वार्म-अप और ग्रिप बनाने में काफी दिक्कतें आईं। दिलीप ने कहा, “मेरी शुरुआत धीमी थी, लेकिन मैंने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ी। खराब मौसम में शरीर सुस्त हो जाता है, फिर भी जीत हासिल करना सुखद रहा।”
अगला लक्ष्य: लॉस एंजिलिस 2028 और एशियाई खेल
दिलीप की नजरें अब भविष्य की बड़ी चुनौतियों पर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अभी नौकरी के बारे में नहीं सोच रहे, बल्कि उनका पूरा ध्यान सितंबर-अक्टूबर में जापान में होने वाले पैरा एशियाई खेलों और उसके बाद लॉस एंजिलिस 2028 पैरालंपिक पर है।
इस सफलता के पीछे उनकी कोच वैजयंथ काले का भी बड़ा हाथ है, जिन्होंने एक स्कूल में दिलीप की प्रतिभा को पहचाना था। काले बताती हैं कि दिलीप को शुरुआत में पैरा स्पर्धाओं के बारे में पता भी नहीं था और वह सामान्य खिलाड़ियों के साथ ही प्रतिस्पर्धा कर उन्हें कड़ी टक्कर दे रहा था। कोच के विश्वास और दिलीप की मेहनत ने आज भारत को इस ऐतिहासिक मुकाम पर पहुँचा दिया है।
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