दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश ने केंद्रीय जांच ब्यूरो के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने पूर्व IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल से जुड़े मामले में कथित तौर पर गलत तथ्य पेश करने के आरोप में CBI के छह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया है।
मामले की शुरुआत कहां से हुई?
पूर्व IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ CBI ने आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया था। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 जनवरी 2016 को इस मामले में अभियोजन स्वीकृति को अमान्य कर दिया। इसके बाद 10 मार्च 2016 को विशेष अदालत ने अग्रवाल को मामले से डिस्चार्ज कर दिया।
इसके बाद उन्होंने जब्त दस्तावेज वापस पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
जवाब में सामने आया विवाद
CBI ने 2 अगस्त 2016 को अदालत में जवाब दाखिल करते हुए कहा कि आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर कानून और संबंधित मंत्रालयों के साथ बातचीत जारी है। लेकिन बाद में सामने आए रिकॉर्ड के मुताबिक, कानून मंत्रालय 8 जून 2016 को ही अपनी राय दे चुका था कि सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए ठोस आधार नहीं है।
यहीं से पूरा विवाद खड़ा हुआ।
हाईकोर्ट ने क्या पाया?
अशोक अग्रवाल ने गलत हलफनामा या बयान देने के आरोप में CrPC की धारा 340 के तहत कार्रवाई की मांग की थी। विशेष अदालत ने 25 अक्टूबर 2025 को उनका आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
जस्टिस मधु जैन की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद विशेष अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना कि अदालत के सामने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए थे।
रिकॉर्ड में कटिंग का भी जिक्र
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि तत्कालीन ज्वाइंट डायरेक्टर विनीत विनायक ने नीली स्याही से कटिंग करते हुए एक इंटरनल ड्राफ्ट लेटर को फाइल में शामिल किया था। इस कटिंग का स्क्रीनशॉट भी अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा बना।
हाईकोर्ट के मुताबिक, 8 जून की कानूनी राय के बावजूद 2 अगस्त को अदालत में दाखिल जवाब में उससे जुड़ी जानकारी सामने नहीं रखी गई।
छह अधिकारियों पर कार्रवाई
अदालत ने IPC की धारा 191, 193 और 209 के तहत लिखित आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया है। जिन अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, उनमें तत्कालीन ज्वाइंट डायरेक्टर विनीत विनायक, DIG अमित कुमार, SP रमन त्यागी, SP प्रेम कुमार गौतम, सब-इंस्पेक्टर सुशील दीवान और तत्कालीन विशेष लोक अभियोजक मोहम्मद आजाद शामिल हैं।
आदेश ने खड़े किए बड़े सवाल
यह मामला सिर्फ छह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसियों से अदालत के सामने पूरी और सही जानकारी रखने की अपेक्षा न्यायिक प्रक्रिया की बुनियादी जरूरत है। अब इस आदेश के बाद यह देखना अहम होगा कि आपराधिक शिकायत की आगे की कार्यवाही किस दिशा में जाती है।
अदालत का यह रुख एक स्पष्ट संदेश देता है—जांच एजेंसी हो या कोई अन्य पक्ष, न्यायालय के सामने तथ्यों को छिपाने या गलत तरीके से पेश करने के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
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