अन्याय की चीत्कार: जब उम्मीदें दम तोड़ देती हैं
“मई का महीना, वो काली रात, जिसने व्यवस्था की क्रूरता को आइने में दिखाया,” रमेश की आवाज़ में दर्द और गुस्सा साफ झलक रहा था। “एक 11 साल की मासूम, जो इंसानियत की शिकार हुई, गंभीर हालत में पटना मेडिकल कॉलेज लाई गई। आठ घंटे… सिर्फ आठ घंटे! एम्बुलेंस में ही उसने ज़िंदगी की आखिरी साँस ली, क्योंकि अस्पताल में उसे एक बिस्तर नसीब नहीं हुआ।”
उन्होंने आगे कहा, “प्रधानमंत्री आते हैं, हवा-हवाई वादे करते हैं, जनता को पल भर के लिए लुभाते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। लेकिन महिलाओं पर हो रहे इन जघन्य अत्याचारों पर उनके होंठ सिल जाते हैं। कैसे न सिलें, जब उनकी अपनी सरकार के मंत्री ऐसे गंभीर आरोपों में फंसे हों?”
रमेश ने 2018 के मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की भयावहता को भी याद किया। “वो दिल दहला देने वाला मामला, जिसने मानवता को झकझोर कर रख दिया था। 34 से ज़्यादा छोटी बच्चियों के साथ लंबे समय तक हुए उस वीभत्स यौन शोषण को कौन भूल सकता है?”
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की आवाज़ नहीं, बल्कि उन अनगिनत आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करती है, जो व्यवस्था की लापरवाही और असंवेदनशीलता के चलते अनसुनी रह जाती हैं। यह उन उम्मीदों की चीत्कार है, जो हर बार सच होने के बजाय दम तोड़ देती हैं।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


