बनारस के कारीगरों का दर्द: एक राष्ट्रीय विमर्श
हाल ही में जन संसद में बनारस के उन कढ़ाई कारीगरों से मुलाकात हुई, जिनके हाथों में पीढ़ियों से रची-बसी कला का जादू है। उनकी व्यथा, आज पूरे भारत के करोड़ों छोटे कारीगरों, दस्तकारों और हुनरमंदों की दर्दनाक हकीकत को बयां करती है। यह विडंबना ही है कि जब उनके स्वयं के सांसद स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, तब भी उन्हें सरकारी उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है।
ये कुशल कारीगर, जो कभी अपनी कला से देश-दुनिया को चकित करते थे, आज अपना परंपरागत व्यवसाय छोड़कर मजबूरी में मजदूरी करने या रिक्शा चलाने को विवश हैं। बनारस, जो अपनी कला और संस्कृति के लिए विख्यात है, आज बेरोजगारी की कड़वी सच्चाई से जूझ रहा है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए रोजगार के अवसर लगभग समाप्त हो चुके हैं। हताश होकर, वे अपने घर-बार और शहर को छोड़कर दूसरे राज्यों और शहरों में काम की तलाश में भटकने को मजबूर हैं। यह स्थिति उन लाखों लोगों की आवाज है, जिनकी प्रतिभा और मेहनत को सरकारी नीतियों की उपेक्षा ने कहीं गुमनाम कर दिया है।
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