मटुआ के साथ गोपाल का ‘बकरा’ कनेक्शन: एक चुनावी पहेली?

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पश्चिम बंगालः मटुआ तो ठीक, ये गोपाल ‘बकरा’ क्या है?

मटुआ: पश्चिम बंगाल की सियासत का वो अनजाना चेहरा, जिसकी हर आहट से कांपती है सत्ता!

पश्चिम बंगाल की सियासी ज़मीन पर, जहाँ हर वोट का अपना वज़न है, एक ऐसा समुदाय है जिसकी चुप्पी भी गूँज पैदा कर देती है – मटुआ। यह समुदाय, राज्य की अनुसूचित जाति की कुल आबादी का 17% से भी ज़्यादा हिस्सा समेटे हुए है, और राजबोंगशियों के बाद दूसरा सबसे बड़ा अनुसूचित जाति समूह है। मटुआ महासंघ के नुमाइंदों, तन्मय बिस्वास और सुखेंदु गायेन के मुताबिक, इनकी आबादी 2.5 करोड़ से 2.75 करोड़ के बीच है, और इनमें से 1.7 करोड़ वो मतदाता हैं, जिनकी उंगलियों पर पश्चिम बंगाल का राजनीतिक भविष्य टिका है।

इनकी पैठ इतनी गहरी है कि कम-से-कम 12 (42 में से) लोकसभा क्षेत्रों और सौ से ज़्यादा (294 में से) विधानसभा क्षेत्रों में मटुआ वोटों की अहमियत को कोई भी दल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नादिया, हावड़ा, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर के सीमावर्ती जिलों और कूचबिहार के कुछ हिस्सों में इनका फैलाव है। मजे की बात तो यह है कि कम-से-कम 21 विधानसभा क्षेत्रों में यह समुदाय बहुसंख्यक की स्थिति में है, जबकि विधानसभा की 68 सीटें ही अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं!

भले ही इनकी दलगत निष्ठाएं कभी इधर, कभी उधर डगमगाती रहें, मटुआ जानते हैं कि उनकी आबादी को कोई भी पार्टी हल्के में नहीं ले सकती। सियासत में इनकी दखलंदाज़ी भी काबिले-तारीफ है, और यही वो वजह है जो इन्हें हमेशा ‘डिमांड’ में रखता है। हर बार, कोई न कोई दल इन्हें लुभाने की कोशिश करता है, और इस बार तो कहानी में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने सबको चौंका दिया है।

30 अगस्त को, मतदाता अधिकार यात्रा के दौरान, राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल मटुआ महासंघ के 24 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। उनके हाथों में जो बैनर था, उस पर लिखा था एक सीधा संदेश: ‘राहुल दादा, बंगाल आइए… एसआईआर-ए-‘बिपद’, कांग्रेस-ए-‘निरापद’ (यानी, एसआईआर यानी खतरा, और कांग्रेस यानी सुरक्षा)। यह मुलाकात जितनी तृणमूल कांग्रेस को बेचैन करने वाली थी, उससे कहीं ज़्यादा बीजेपी को हैरान करने वाली थी, क्योंकि इसका आयोजन उनके ही एक असंतुष्ट स्थानीय आयोजक, तपन हलदर, ने किया था। इस घटना ने मटुआ समुदाय की उन चिंताओं को भी ज़ोरदार तरीके से सामने ला दिया है, जो हर बार नागरिकता का सवाल उठते ही बेचैन हो उठते हैं।


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