गाजा की दर्दनाक त्रासदी पर भारत की भूमिका: एक तीखा सवाल
कार्यसमिति ने गाजा में हुए निर्दोष नागरिकों के नरसंहार पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है। यह विडंबना है कि भारत, जो सदैव नैतिक चेतना का प्रतीक और उत्तर-औपनिवेशिक विश्व का मार्गदर्शक रहा है, वर्तमान सरकार के कार्यकाल में इस गंभीर मानवीय संकट का केवल एक मूक दर्शक बनकर रह गया है, जो अत्यंत शर्मनाक है।
यह उस कड़वी हकीकत की ओर इशारा करता है कि जहां एक ओर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय गाजा में हो रही बर्बरता पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं भारत की तटस्थता एक प्रश्नचिन्ह लगाती है।
यह ध्यान देने योग्य है कि हाल ही में, ट्रंप प्रशासन की मध्यस्थता से इजरायल और हमास के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत गाजा में संघर्ष विराम और कुछ बंधकों तथा कैदियों की रिहाई पर सहमति बनी है। यह समझौता, पिछले दो वर्षों से जारी विनाशकारी युद्ध में एक महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतीक है। हालांकि, इस समझौते की सफलता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि इजरायल, गाजा में अपने सैन्य अभियान को कितनी गंभीरता से और किस हद तक रोकता है।
भारत का इस महत्वपूर्ण क्षण में मौन रहना, उसके वैश्विक नैतिक नेतृत्व के दावे पर सवाल खड़े करता है। क्या यह वही भारत है जिसने हमेशा न्याय और मानवाधिकारों का पक्ष लिया है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
