आतंक के ताने-बाने का एक और तार: जट्ट का खौफनाक चेहरा
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नजरों में वह कोई नया नाम नहीं है। 2000 के दशक की शुरुआत से, जब वह जम्मू और कश्मीर की वादियों में सक्रिय था, उसके कारनामों का हिसाब रखा जा रहा है। 2005 में पाकिस्तान की सीमा में लौट जाने तक, उसने घाटी में आतंक काबिज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लश्कर-ए-तैयबा के एक प्रमुख सदस्य के तौर पर, जब इस संगठन ने ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ नामक एक मुखौटा तैयार किया, तो ऑपरेशंस की कमान संभालने की जिम्मेदारी इसी जट्ट को सौंपी गई।
पहलगाम में हुए हालिया हमले की भयावहता के पीछे भी इसी का हाथ है। लेकिन इसका आतंक यहीं नहीं थमता। 2024 में रियासी में बस पर हुए उस दिल दहला देने वाले हमले की साजिश भी उसी ने रची थी, जिसमें नौ निर्दोष तीर्थयात्री काल के गाल में समा गए। इससे पहले भी, 2013 में श्रीनगर में भारतीय सैनिकों पर हुए कायरतापूर्ण हमले और 2002 में बडगाम में एक स्टेशन हाउस ऑफिसर की निर्मम हत्या में भी इसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत हैं।
2023 में पूंछ के भाटा धुरियां में हुए उस घातक हमले की भयावह योजना का सूत्रधार भी जट्ट ही था, जिसमें पांच वीर भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। सुरक्षा अधिकारी मानते हैं कि उसके खिलाफ चार्जशीट ही पाकिस्तान द्वारा फैलाई जा रही झूठी कहानियों और उसके दुर्भावनापूर्ण इरादों का पर्दाफाश करने के लिए काफी है।
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