76 वर्ष पूर्व, डॉ. आंबेडकर के महानतम भाषण की गूंज: संविधान की नींव और कांग्रेस का योगदान
आज से ठीक 76 वर्ष पूर्व, 26 नवंबर, 1949 को, भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने एक ऐतिहासिक क्षण में, भारत के संविधान के मसौदे को औपचारिक रूप से अनुमोदन के लिए संविधान सभा में प्रस्तुत किया। यह वह अवसर था जब उन्होंने अपना ऐसा समापन भाषण दिया, जिसे आज भी 20वीं सदी के महानतम भाषणों में गिना जाता है।
‘बेतरतीब भीड़’ से ‘अनुशासित व्यवस्था’ तक: आंबेडकर का दूरदृष्टि
डॉ. आंबेडकर ने अपने भाषण की शुरुआत में एक मार्मिक दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कहा, “मसौदा समिति का कार्य अत्यंत दुष्कर हो सकता था, यदि यह संविधान सभा केवल एक बेतरतीब भीड़ के रूप में कार्य करती – जैसे बिना सीमेंट का जुड़ाव, जहाँ काले और सफेद पत्थर बेतरतीब बिखरे हों। ऐसी स्थिति में, हर सदस्य या समूह अपने आप में एक स्वतंत्र कानून की तरह होता, और परिणाम केवल अराजकता होती।”
कांग्रेस पार्टी की निर्णायक भूमिका: व्यवस्था और अनुशासन का सूत्रधार
लेकिन, डॉ. आंबेडकर ने इस संभावित अराजकता को टालने में कांग्रेस पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि “यह संभावित अराजकता कांग्रेस पार्टी की उपस्थिति के कारण समाप्त हो गई। कांग्रेस ने संविधान सभा की कार्यवाही में व्यवस्था और अनुशासन की भावना का संचार किया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि एक सुविचारित और एकीकृत संविधान का निर्माण संभव हो सके।”
यह भाषण न केवल भारतीय संविधान के निर्माण के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और विभिन्न दलों के योगदान पर भी प्रकाश डालता है। डॉ. आंबेडकर की दूरदर्शिता और कांग्रेस पार्टी का संगठनात्मक सामंजस्य, मिलकर एक ऐसे संविधान की नींव रखने में सफल हुए, जिसने स्वतंत्र भारत के मार्ग को प्रशस्त किया।
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