पूर्व सेना प्रमुख की अनकही दास्तां: जब सरहद पर ‘हॉट पोटैटो’ बन गए थे हालात
2020 लद्दाख स्टैंडऑफ (चीन के साथ): 31 अगस्त 2020 की वह खौफनाक रात, जब पैंगोंग त्सो के रेचिन ला पास पर चीनी टैंक और भारतीय सेना की चौकियां महज चंद सौ मीटर की दूरी पर थीं। युद्ध की आहट साफ थी और स्थिति ‘ब्रेकिंग पॉइंट’ तक पहुंच चुकी थी। नॉर्दर्न कमांड चीफ लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी के फोन कॉल के बाद, जनरल नरवणे ने तुरंत रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, NSA डोभाल, CDS बिपिन रावत और विदेश मंत्री को लाइन पर लिया और सीधा सवाल किया— ‘मेरे लिए क्या आदेश हैं?’
अपनी अनपब्लिश्ड किताब में नरवणे ने खुलासा किया कि उस वक्त उन्हें ‘हॉट पोटैटो’ थमा दिया गया था, यानी सारी जिम्मेदारी उनके अकेले के कंधों पर डाल दी गई। दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक के बीच वह गहरी सांस लेकर कुछ पल मौन रहे, क्योंकि ऊपर से फायरिंग का कोई स्पष्ट आदेश नहीं आया था। प्रोटोकॉल के मुताबिक ‘टॉप क्लियरेंस’ के बिना गोली नहीं चलानी थी। नरवणे ने यह भी लिखा कि जून 2020 के गलवान संघर्ष में मिली चोट को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग कभी नहीं भूल पाएंगे।
अग्निपथ योजना: जून 2022 में जब अग्निपथ स्कीम लॉन्च हुई, तो सेना दंग रह गई। नौसेना और वायु सेना के लिए तो यह किसी ‘आसमानी बिजली’ गिरने जैसा था। जनरल नरवणे ने बताया कि सेना का मूल प्रस्ताव एक छोटा पायलट प्रोजेक्ट था, जिसमें 75% सैनिकों को रिटेन करना था। लेकिन फाइनल स्कीम में इसे पूरी तरह पलट दिया गया और 75% को रिलीज करने का नियम बना।
सबसे बड़ा विवाद सैलरी को लेकर था। शुरुआती 20 हजार रुपए की तनख्वाह को नरवणे ने ‘अस्वीकार्य’ करार दिया। उन्होंने कड़े शब्दों में लिखा, ‘देश के लिए जान देने वाले एक प्रशिक्षित सैनिक की तुलना दिहाड़ी मजदूर से कैसे की जा सकती है?’ उनके भारी विरोध के बाद ही शुरुआती वेतन को बढ़ाकर 30 हजार रुपए किया गया।
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